"
When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.
"
श्री माँ(मीरा) का जन्म पेरिस (फ्रांस) में 21 फरवरी 1878 को हुआ था। उनके पिता अल्फासा तुर्क बैंकर थे। माता मातील्द इस्लामुन (मिस्त्री) काहीरा की थी। इन्हें दो संतानें हुई। मातिओ और मीरा। मीरा के जन्म के एक वर्ष पूर्व ही माता-पिता फ्रांस आकर बस गये थे। मीरा की माँ अत्यन्त सुंदर, सुसंस्कृत, अनुशासन प्रिय तथा आधुनिक विचारों की थी।
(श्री माँ) मीरा बचपन से ही अन्य बालकों से अलग थी। जहाँ छोटे बच्चे खेल-कूद, मज़ाक-मस्ती की ज़िंदगी जीते हैं मन पसंद की चीजों को प्राप्त करना उनका ध्येय होता है। वहाँ छोटी-सी मीरा अक्सर गहरे ध्यान में चली जाती थी। मीरा बहुत सचेतन, गंभीर, चिंतनशील दृढ़ संकल्पी और योगी स्वभाव की थी। बहुत छोटी उम्र में उन्हें असाधारण स्वप्न, अंतर्दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुआ करती थी। इसी समय उन्हें धरती पर अपने जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य का ज्ञान और भान हो चुका था ।
उन्हें सदैव अनुभव होता था कि जिस चीज़ के बारे में अभी तक कोई कुछ भी नहीं जानता उस विशेष कार्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिये वे धरती पर आई हैं। इसके प्रति वह पूर्ण सचेतन थी।
श्री माँ (मीरा) ने बहुत छोटी उम्र में ही अक्षर ज्ञान के पूर्व ही ध्यान करना सीख लिया था। श्री माँ के शब्दों में –“मैंने चार वर्ष की आयु से चिंतन तथा अपना योग करना शुरू कर दिया था। मीरा के अनुसार –“मेरी एक कुर्सी थी जिस पर मैं ध्यान में तल्लीन होकर शांत बैठा करती थी। तब मेरे सिर के ऊपर बहुत चमकीली ज्योति अवतरित होती थी। जो दिमाग के भीतर कुछ हलचल पैदा करती थी।”
श्री माँ(मीरा) का जन्म पेरिस (फ्रांस) में 21 फरवरी 1878 को हुआ था। उनके पिता अल्फासा तुर्क बैंकर थे। माता मातील्द इस्लामुन (मिस्त्री) काहीरा की थी। इन्हें दो संतानें हुई। मातिओ और मीरा। मीरा के जन्म के एक वर्ष पूर्व ही माता-पिता फ्रांस आकर बस गये थे। मीरा की माँ अत्यन्त सुंदर, सुसंस्कृत, अनुशासन प्रिय तथा आधुनिक विचारों की थी।
(श्री माँ) मीरा बचपन से ही अन्य बालकों से अलग थी। जहाँ छोटे बच्चे खेल-कूद, मज़ाक-मस्ती की ज़िंदगी जीते हैं मन पसंद की चीजों को प्राप्त करना उनका ध्येय होता है। वहाँ छोटी-सी मीरा अक्सर गहरे ध्यान में चली जाती थी। मीरा बहुत सचेतन, गंभीर, चिंतनशील दृढ़ संकल्पी और योगी स्वभाव की थी। बहुत छोटी उम्र में उन्हें असाधारण स्वप्न, अंतर्दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुआ करती थी। इसी समय उन्हें धरती पर अपने जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य का ज्ञान और भान हो चुका था ।
उन्हें सदैव अनुभव होता था कि जिस चीज़ के बारे में अभी तक कोई कुछ भी नहीं जानता उस विशेष कार्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिये वे धरती पर आई हैं। इसके प्रति वह पूर्ण सचेतन थी।
श्री माँ (मीरा) ने बहुत छोटी उम्र में ही अक्षर ज्ञान के पूर्व ही ध्यान करना सीख लिया था। श्री माँ के शब्दों में –“मैंने चार वर्ष की आयु से चिंतन तथा अपना योग करना शुरू कर दिया था। मीरा के अनुसार –“मेरी एक कुर्सी थी जिस पर मैं ध्यान में तल्लीन होकर शांत बैठा करती थी। तब मेरे सिर के ऊपर बहुत चमकीली ज्योति अवतरित होती थी। जो दिमाग के भीतर कुछ हलचल पैदा करती थी।”
मीरा बैठी-बैठी स्वयं का अवलोकन किया करती थी। अंदर होने वाली क्रियाओं को देखा करती थी कि कौनसी शक्तियां उन्हें प्रभावित और संचालित करती है। इस तरह अभ्यास द्वारा पाँच वर्ष की उम्र में मीरा स्वयं की साक्षी बन गई। उसकी मुद्रा को देखकर माँ ने पूछा क्या बात है तू इतनी गंभीर क्यों रहती है? ऐसा लगता है कि सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर है। नन्हीं मीरा सिर हिलाकर संक्षिप्त उत्तर देती – हाँ।
एक दिन पिता मीरा को सर्कस दिखाने ले जाना चाहते थे, मीरा ने तुरंत निर्णय लिया और जाने से मना कर दिया और कहा – “मुझे यहीं मज़ा आता है।” एक ज्योतिर्मय आभा मंडल सदैव मीरा के चारों ओर रहता था। यह ज्योतिर्मय आभा चक्र सदैव उसका मार्गदर्शक ज्योति बनकर रहा। कभी-कभी जिज्ञासा वश वह अपनी माँ से इस आभा चक्र के बारे में अवश्य पूछती थी। परंतु माँ उसकी बातों में ध्यान नहीं देती थी। अतः ध्यान में दिखने वाले विविध रंगों और प्रकाश के बारे में मीरा बाहरी रूप से कुछ न जान सकी।
मीरा बैठी-बैठी स्वयं का अवलोकन किया करती थी। अंदर होने वाली क्रियाओं को देखा करती थी कि कौनसी शक्तियां उन्हें प्रभावित और संचालित करती है। इस तरह अभ्यास द्वारा पाँच वर्ष की उम्र में मीरा स्वयं की साक्षी बन गई। उसकी मुद्रा को देखकर माँ ने पूछा क्या बात है तू इतनी गंभीर क्यों रहती है? ऐसा लगता है कि सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर है। नन्हीं मीरा सिर हिलाकर संक्षिप्त उत्तर देती – हाँ।
एक दिन पिता मीरा को सर्कस दिखाने ले जाना चाहते थे, मीरा ने तुरंत निर्णय लिया और जाने से मना कर दिया और कहा – “मुझे यहीं मज़ा आता है।” एक ज्योतिर्मय आभा मंडल सदैव मीरा के चारों ओर रहता था। यह ज्योतिर्मय आभा चक्र सदैव उसका मार्गदर्शक ज्योति बनकर रहा। कभी-कभी जिज्ञासा वश वह अपनी माँ से इस आभा चक्र के बारे में अवश्य पूछती थी। परंतु माँ उसकी बातों में ध्यान नहीं देती थी। अतः ध्यान में दिखने वाले विविध रंगों और प्रकाश के बारे में मीरा बाहरी रूप से कुछ न जान सकी।
मीरा बैठी-बैठी स्वयं का अवलोकन किया करती थी। अंदर होने वाली क्रियाओं को देखा करती थी कि कौनसी शक्तियां उन्हें प्रभावित और संचालित करती है। इस तरह अभ्यास द्वारा पाँच वर्ष की उम्र में मीरा स्वयं की साक्षी बन गई। उसकी मुद्रा को देखकर माँ ने पूछा क्या बात है तू इतनी गंभीर क्यों रहती है? ऐसा लगता है कि सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर है। नन्हीं मीरा सिर हिलाकर संक्षिप्त उत्तर देती – हाँ।
एक दिन पिता मीरा को सर्कस दिखाने ले जाना चाहते थे, मीरा ने तुरंत निर्णय लिया और जाने से मना कर दिया और कहा – “मुझे यहीं मज़ा आता है।” एक ज्योतिर्मय आभा मंडल सदैव मीरा के चारों ओर रहता था। यह ज्योतिर्मय आभा चक्र सदैव उसका मार्गदर्शक ज्योति बनकर रहा। कभी-कभी जिज्ञासा वश वह अपनी माँ से इस आभा चक्र के बारे में अवश्य पूछती थी। परंतु माँ उसकी बातों में ध्यान नहीं देती थी। अतः ध्यान में दिखने वाले विविध रंगों और प्रकाश के बारे में मीरा बाहरी रूप से कुछ न जान सकी।
मीरा बैठी-बैठी स्वयं का अवलोकन किया करती थी। अंदर होने वाली क्रियाओं को देखा करती थी कि कौनसी शक्तियां उन्हें प्रभावित और संचालित करती है। इस तरह अभ्यास द्वारा पाँच वर्ष की उम्र में मीरा स्वयं की साक्षी बन गई। उसकी मुद्रा को देखकर माँ ने पूछा क्या बात है तू इतनी गंभीर क्यों रहती है? ऐसा लगता है कि सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर है। नन्हीं मीरा सिर हिलाकर संक्षिप्त उत्तर देती - हाँ।
एक दिन पिता मीरा को सर्कस दिखाने ले जाना चाहते थे, मीरा ने तुरंत निर्णय लिया और जाने से मना कर दिया और कहा - “मुझे यहीं मज़ा आता है।” एक ज्योतिर्मय आभा मंडल सदैव मीरा के चारों ओर रहता था। यह ज्योतिर्मय आभा चक्र सदैव उसका मार्गदर्शक ज्योति बनकर रहा। कभी-कभी जिज्ञासा वश वह अपनी माँ से इस आभा चक्र के बारे में अवश्य पूछती थी। परंतु माँ उसकी बातों में ध्यान नहीं देती थी। अतः ध्यान में दिखने वाले विविध रंगों और प्रकाश के बारे में मीरा बाहरी रूप से कुछ न जान सकी।
मीरा बैठी-बैठी स्वयं का अवलोकन किया करती थी। अंदर होने वाली क्रियाओं को देखा करती थी कि कौनसी शक्तियां उन्हें प्रभावित और संचालित करती है। इस तरह अभ्यास द्वारा पाँच वर्ष की उम्र में मीरा स्वयं की साक्षी बन गई। उसकी मुद्रा को देखकर माँ ने पूछा क्या बात है तू इतनी गंभीर क्यों रहती है? ऐसा लगता है कि सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर है। नन्हीं मीरा सिर हिलाकर संक्षिप्त उत्तर देती - हाँ।
एक दिन पिता मीरा को सर्कस दिखाने ले जाना चाहते थे, मीरा ने तुरंत निर्णय लिया और जाने से मना कर दिया और कहा - “मुझे यहीं मज़ा आता है।” एक ज्योतिर्मय आभा मंडल सदैव मीरा के चारों ओर रहता था। यह ज्योतिर्मय आभा चक्र सदैव उसका मार्गदर्शक ज्योति बनकर रहा। कभी-कभी जिज्ञासा वश वह अपनी माँ से इस आभा चक्र के बारे में अवश्य पूछती थी। परंतु माँ उसकी बातों में ध्यान नहीं देती थी। अतः ध्यान में दिखने वाले विविध रंगों और प्रकाश के बारे में मीरा बाहरी रूप से कुछ न जान सकी।
मीरा ने अपनी माँ से प्रत्येक कर्म सफाई, पूर्णता और आनंद से करना सीख लिया था। कर्म के संबंध में मीरा का अनुभव –“सच्चाई से किया गया कर्म ही ध्यान है।”
ग्यारह से तेरह वर्ष की आयु के बीच मीरा को अन्तरात्मिक और आध्यात्मिक अनुभूतियों में ईश्वर के अस्तित्व का ज्ञान हो चुका था। ईश्वर से जुड़ने, चेतना और कर्म में उसे पाने का रहस्य ज्ञात हुआ। धरती पर रहते हुए मानव दिव्य जीवन कैसे जीये, उसकी संभावना को खोज लिया।
श्री माँ को तेरह वर्ष की उम्र में रात्रि को स्वप्न में कई आध्यात्मिक गुरुओं के दर्शन होते थे। वे उन्हें सूक्ष्म आदेश और संदेश देते थे। साथ ही भविष्य का मार्ग भी दिखाते थे। एक आकृति कई बार उसके स्वप्न में आती थी। वे उन्हें ‘श्रीकृष्ण’ मानती थी। उन्हें संदेश में बताया गया कि उसका भविष्य इसी आकृति के साथ जुड़ा है और दोनों का कार्य-क्षेत्र ‘भारत’ होगा। उन्हें विश्वास था कि एक दिन वे उनसे अवश्य मिलेंगी।
मीरा प्रतिदिन डायरी लिखा करती थी। अंदर जो भी घटित होता था - विचार, भाव, संवेदनाएँ, प्रार्थनाएँ, अभीप्साएँ। उन्हें पढ़कर आज भी ऐसा लगता है कि जैसे हम प्रत्यक्ष दृश्यों को अपनी आखों से देख रहे हैं। ऐसा ही एक अद्भुत स्वप्न मीरा ने अपनी डायरी में लिखा –“प्रत्येक रात्रि को ज्यों ही मैं बिछौने पर लेटती, मुझे ऐसा मालूम होता कि मैं अपने शरीर से बाहर निकाल आई हूँ। और सीधी ऊपर की ओर फिर शहर के ऊपर, बहुत ऊंचाई पर उठ गयी हूँ ।”
युवा मीरा मात्र संकल्प से दिव्य शक्ति का आव्हान करके समस्या ग्रस्त लोगों को सहायता पहुंचा देती थी। उन्हें 15-16वर्ष की आयु में बिना किसी गुरु की सहायता से नीरव ध्यान सहज लग जाता था।
भगवान के प्रति विशेष आकर्षण होने के कारण मीरा के इर्द-गिर्द जिज्ञासुओं और आदर्शवादियों का समूह केंद्रित होने लगा। एक गहन आध्यात्मिक जीवन जीने की अभीप्सा का क्रम आगे बढ़ने लगा।
प्रकृति प्रेमी मीरा वृक्षों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की चेतना के साथ छोटी उम्र में ही एकत्व प्राप्त कर चुकी थीं। वे इनके मूक संकेतों और मर्मर - ध्वनियों को सहज सुन लेती थी।
मीरा पेरिस के पास फॉन्तेब्लुन वन में वह प्रातः घूमने जाया करती थी। वह वृक्षों से बातें करती थी। उसे यह वृक्ष ध्यान मग्न ऋषि के सदृश लगते थे। मीरा भी इन वृक्षों के नीचे बैठ कर ध्यान मग्न हो जाती थी।
सन् 1968 में ओरोविल उषानगरी भूमि पूजन के समय वहाँ स्थित एक विशाल वृक्ष को काटने की तैयारी की गई। उसी रात वृक्ष ने अपनी पीड़ा मीरा को बताते हुए कहा –“मुझे क्यों काटा जा रहा है। मैं तो वर्षों से यहाँ खड़ा हूँ।” माँ ने तत्काल कर्मचारियों को वृक्ष काटने से मना कर दिया। आज ओरोविल की समृद्धि में इस विशाल वट वृक्ष के सौन्दर्य ने चार चांद लगा दिये हैं । वहाँ जाकर लोग अनुभव करते हैं कि यह वट वृक्ष नहीं कोई ‘आशीर्वाद’ वृक्ष है।
श्री माँ(मीरा) की अभिरुचियाँ कला और संगीत थी। सब चीजों में उनका एक मात्र लक्ष्य था ‘ईश्वर की खोज और आध्यात्मिक सिद्धि’। वे इस उम्र में भगवान की उपस्थिति के साथ चेतन और सतत एकत्व प्राप्त कर चुकी थी। 21 वर्ष की उम्र में गीता के स्वाध्याय के दौरान सर्वव्यापी ईश्वर के रूप में‘श्रीकृष्ण’ की अनुभूति हुई।
29 मार्च 1914 को मीरा अपने पति पॉल रिशार के साथ श्रीअरविन्द से भेंट करने पांडिचेरी आई। तब श्रीअरविन्द को देखते ही पहचान गई। ये ही उसके अंतर्दर्शन में आने वाले‘श्रीकृष्ण’ है।
मीरा श्रीअरविन्द के चरणों में बैठ गई। मौन। शांत। अपने विचारों, धारणाओं और पूर्वाग्रहों का त्याग कर दिया। मन खाली हो गया। अंदर एक अनंत शांति और गहन आंतरिक परिवर्तन का अनुभव किया। अन्दर एक नया जीवन खिलनें लगा। मीरा असीम कृतज्ञता से भर उठी। उन्होंने लिखा-“मैं अंतत: उस दरवाजे पर पहुँच गई हूँ जिसे मैं लंबे समय से ढूंढ रही थी।”
मीरा ने श्रीअरविन्द से भेंट के बाद डायरी में लिखा-“कोई बात नहीं यदि हजारों प्राणी गहनतम अज्ञान में डूबे हुए हैं। वे जिन्हें हमने कल देखा वे तो पृथ्वी पर ही हैं। उनकी उपस्थिति यह सिद्ध करने के लिये काफी है कि एक दिन आयेगा जब अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो जायेगा, जब तेरा राज्य पृथ्वी पर कार्य रूप में अवश्य ही स्थापित होगा।”
मीरा ने मासिक पत्रिका‘आर्य’ के प्रकाशन में श्रीअरविन्द को सहयोग दिया। लेकिन कुछ माह पश्चात् प्रथम विश्व युद्ध छिड़ जाने की परिस्थितियों के कारण उन्हें फ्रांस वापिस जाना पड़ा। 1916 में वे जापान गयी। वहाँ उच्च जीवन के जिज्ञासु मीरा से जुड़ गये। वहाँ मीरा ने एक आध्यात्मिक मंडल की स्थापना की।
मीरा ने अल्जीरिया जाकर थेंआ से गुह्य विद्याओं का विधिवत अभ्यास सीखा। यहाँ उन्हें कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हुई।
"मैं किसी देश,किसी सभ्यता,किसी समाज,किसी जाति की नहीं हूँ,मैं केवल भगवान् की हूं। मैं किसी मालिक,शासक,कानून,सामाजिक प्रथा का हुकुम नहीं मानती,केवल भगवान् की आज्ञा का पालन करती हूँ ।
मैंने अपना सब कुछ,इच्छा,जीवन,आत्मा उन्हें अर्पित कर दिया है । अगर उनकी इच्छा हो तो मैं एक-एक बूंद करके अपना सारा रक्त,पूरे आनंद के साथ उन्हें अर्पित कर सकती हूँ । उनकी सेवा में कुछ भी बलिदान न होगा क्योंकि सब कुछ पूर्ण आनंद होगा।"
24 अप्रेल 1920 को श्री माँ (मीरा) स्थायी रूप से पांडिचेरी (भारत) श्रीअरविन्द की सेवा में आ गई। श्रीअरविन्द के साथ उनके 4-5शिष्य रहते थे। श्री माँ के आगमन से घर की व्यवस्था और जीवन–शैली में अपरिहार्य परिवर्तन होते गये। शनैः शनैः वे प्रेम, सेवा-कार्यों, साधना और अनुशासन से इस समुदाय का प्रधान अंग और सबकी प्रिय मधुर ‘माँ’ बन गई। अबसे श्री माँ का एकमात्र लक्ष्य हो गया, श्रीअरविन्द का कार्य करना।
“ श्रीअरविन्द का कार्य स्वयं एक शक्ति है,यह भारत को और उसके द्वारा समस्त संसार को इस भावना के प्रति जागृत करने के लिये अवतरित हुई है कि स्वयं मनुष्य स्वभाव में परिवर्तन लाये और उसे जीवन में सिद्ध करे।”
श्रीअरविन्द का मूल कार्य था – धरती पर अनोखा रूपान्तर। नये विश्व, नयी मानवता और नये समाज का निर्माण। जिसमें नयी चेतना अभिव्यक्त एवं मूर्त हो। स्वभावत: यह एक सामूहिक आदर्श था जिसको समन्वित मानवीय पूर्णता के रूप में साकार करने के लिये सामूहिक प्रयास की अपेक्षा थी।
इस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में पहली मंजिल‘श्रीअरविन्द आश्रम’ रहा। जिसकी स्थापना और निर्माण सहज में श्रीमाँ के आगमन से हो गया। दूसरी मंजिल‘ओरोविल’ की स्थापना है। इसका उद्देश्य मानव एकता को सिद्ध करना है। एक ऐसा अंतर्राष्ट्रीय नगर बनाना, जहाँ सभी देशों के स्त्री-पुरुष, बच्चे शांति और प्रगतिशील सामंजस्य में रह सके। सब मतों, राजनीति और राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर । ताकि आत्मा और शरीर, पुरुष और प्रकृति तथा स्वर्ग और धरती के बीच समरसता स्थापित करने वाला सामूहिक जीवन संभव हो सके।
श्री माँ की तीसरी मंजिल है - श्रीअरविन्द सोसायटी। श्री माँ ने जिसकी स्थापना सन् 1960 में की । इसका एकमात्र उदेश्य है - प्रत्येक व्यक्ति सामूहिक साधना और कर्म द्वारा अपनी चेतना के आमूल - चूल रूपांतरण और अपने अंदर भगवान की उपस्थिति और अभिव्यक्ति के प्रति सचेतन बने और उसे सिद्ध करे । श्रीअरविन्द सोसायटी की स्थायी अध्यक्षा श्री माँ है ।
17 नवम्बर 1973 को श्री माँ ने सायं 7:25 बजे अपना शरीर त्याग दिया किन्तु उनकी चेतना और प्रत्यक्ष उपस्थिति पूर्ववत् अनुभव होती है।
श्रीमाँ श्रीअरविन्द ने नवीन सृष्टि की नींव रख दी है। उनके द्वारा निर्मित सृष्टि सतत उनके मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से विकास की ओर अग्रसर है। श्री माँ के अनुसार –"वास्तविक आध्यात्मिकता जीवन से वैराग्य में नहीं हैं, बल्कि जीवन को दिव्य पूर्णता से पूर्ण बनाने में है।”
श्रीमाँ द्वारा रचित‘मातृवाणी’ के दिव्य ग्रन्थ हमें नई दिशा प्रदान करते हैं।
"जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा के नाते में फ्रांसीसी हूँ परन्तु प्रवृत्ति और अभिरुचि के नाते में भारतीय हूँ। मेरी चेतना में इन दोनों में कोई विरोध नहीं हैं बल्कि, इसके विपरीत उनका प्रत्युत्तम सामंजस्य है और वे एक दूसरे के पूरक हैं। मैं यह भी जानती हूँ कि मैं दोनों ही को एक समान रूप से अपनी सेवाएँ अर्पित कर सकती हूँ क्योंकि मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है श्रीअरविन्द की महान् शिक्षाओं को मूर्त्त रूप प्रदान करना और श्रीअरविन्द अपनी वाणी द्वारा यह तथ्य उजागर करते हैं कि सभी राष्ट्र तत्वत: एक हैं और संगठित तथा समरसतापूर्ण वैविध्य द्वारा वे धरती पर भागवत ऐक्य को ही अभिव्यक्त करने के निमित्त निर्मित हैं।”
भारत के प्रति उनका प्रेम और सम्मान अतुलनीय है। वे भारत को विश्व गुरु मानती थी। श्रीमाँ के असीम प्रेम,त्याग और आत्मबलिदान ने ही श्रीअरविन्द को विश्व के समक्ष अभिव्यक्त किया अन्यथा सारा जगत श्री अरविन्द के जीवन की दिव्यता, उनके पूर्ण योग की साधना और ईश्वर निर्दिष्ट कार्य से अनभिज्ञ रह जाता। हम सब श्री माँ के चिर ऋणी हैं।
