दिव्य सन्देश

"

When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands. You just go to and do your best.

"

blank

चेतना क्या है ?

जब प्रभु स्वयं अपने बारे में सचेतन होते हैं तो जगत की सृष्टि होती है । चेतना वह श्वांस है जो सबको जीवन देती है ।

मधुर मां कृपया मुझे चेतना का अर्थ बताइये ?

चेतना के बिना तुम्हें यह भी पता न होता कि तुम जीवित हो।

चेतना किसी चीज़ के बारे में तादात्मय द्वारा अभिज्ञ होने कि क्षमता है । भागवत चेतना केवल अभिज्ञ ही नहीं होती बल्कि जानती और सम्पन्न करती है । उदाहरण के लिये किसी स्पन्दन के बारे में अभिज्ञ होने का मतलब यह नहीं है कि तुम उसके बारे में सबकुछ जानते हो।

भागवत चेतना में नीचे कि छोटी से छोटी चीज़ें भी ऊपर की श्रेष्ठतम चीजों के साथ एक होती है।

परम्परागत योग तथा महायोगी महर्षि श्रीअरविन्द का पूर्णयोग

उर्ध्वारोहण करती हुई चेतना के विकास-क्रम में मनश्चेतना-नामधारिणी मध्यवर्ती सत्ता ‘मनुष्य’ की शक्ति की इयत्ता नहीं,  वह कल्पनातीत है । जल में, थल में, नभ में और पाताल में मनुष्य की गति अबाध है । भगवत्-कृपा- स्वरूप प्राप्त योग का आश्रय लेकर मनुष्य जो चाहे सो बन सकता है, लघुकाय, विशालकाय, देव, अतिमानव अथवा दानव । मानव ईश्वर की योग – शक्ति का चमत्कार है।

- डॉ. बी. एल. गुप्ता दादाजी
ज्ञान-दीपक के प्रकाश में -

जबसे मनुष्य इस पृथ्वी पर आया है, तभी से वह अपने परम एवं पूर्णअंशी, अपनी दिव्य सत्ता के साथ अपने-आपको एक करने के प्रयत्न में रत है। मनुष्य के अन्दर उस परात्परा शक्ति ने जो ज्ञान-दीप जला रखा है, उसके प्रकाश में, अपनी सत्ता में निहित प्रसुप्त क्षमताओं और शक्तियों को देखते हुए, उन्हें जगाते हुए, वह बढ़ता चला जा रहा है सत्य की शोध में, खंड बोधों से अखंड ज्ञान की ओर, आत्म परिपूर्णता की दिशा में विधि बद्ध प्रयत्न करता हुआ, व्यष्टि चेतना से समष्टि चेतना की ओर और उससे भी आगे परात्पर सत्ता से जा मिलने के लिये । बस, इस परात्पर तत्व अथवा भगवान के साथ या सर्वोपरि दिव्य तत्व या सर्वोच्च जागृत सत्ता के साथ एकत्व प्राप्त करने की चेष्टा का ही नामयोग है ।  श्रीअरविन्द  के शब्दों में,मानवीय  तथा व्यक्तिगत चेतना का दिव्य चेतना के साथ  संस्पर्श ही योग का वास्तविक मर्म है । जो अंश विश्व-लीला के प्रसंग में पृथक् हो गया है, उसका अपनी ही सत्य आत्मा, मूल सत्ता व विश्वसत्ता के साथ मिलन – यह है योग का अर्थ । श्रीअरविन्द  के अनुसारयोग के द्वारा हम असत्य से सत्य में,  निर्बलता से शक्ति में,  दुःख और क्लेश से परम आनंद में,  बंधन से मुक्ति में, मृत्यु से अमरत्व में, अंधकार से प्रकाश में, सम्मिश्रण से शुद्धता में, अपूर्णता से पूर्णता में, आत्म-विभाजन से एकत्व में, माया से ईश्वर में आरोहण कर सकते हैं …………..l

विकास-क्रम में मनुष्य एक मध्यवर्ती सत्ता -

वास्तव में देखा जाये तो ‘मनुष्य कोई एक अमिश्र और अखंड सत्ता नहीं है l’ वह विकास-क्रम में गुजरती हुई एक ऐसी मध्यवर्ती सत्ता है जिसके पास शरीर, प्राण, मन, आध्यात्म-बोध प्राप्ति के उपकरण है । इस प्रकार उसकी सत्ता के अनेक खण्ड अथवा स्तर हैं जिन्हें योग की भाषा में अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष तथा आनंदमय कोष के नाम से अभिहित किया गया है । भगवान की परा और अपरा दोनों प्रकृतियों के सभी स्तर उसमें विन्यस्त नजर आते हैं । स्थूल और सामान्य दृष्टि से भी उसके तीन प्रधान स्तर तो एक-के-ऊपर-एक स्पष्टतया देखे ही जा सकते हैं । सबसे निचला एवं प्रथम स्तर है अपरा प्रकृति के पाँच-भौतिक तत्वों से गठित एवं निर्मित यह देह अथवा शरीर तथा इस देह को संजीवित रखने वाली एवं संचालित करने वाली जीवनी शक्ति जिसे प्राण-शक्ति कहा जाता है । इस देह एवं प्राण के प्रथम स्तर के ऊपर का द्वितीय स्तर है मन का, इसके ऊपरी क्षेत्र में बुद्धि, विचार, चिंतन अथवा भाव आदि के क्रियाकलाप सदैव चलते रहते हैं ।

  इसके ऊपर का तीसरा उच्चतम ऊर्ध्वतम और सर्वोत्तम तथा सूक्ष्मतम स्तर है । अध्यात्म बोध का अथवा आत्मा का जो ‘अमृतत्व का अधिष्ठान है ।‘ यही सृष्टि का चरम एवं परम लक्ष्य है । परा प्रकृति से निर्मित यह स्तर तो शुद्ध है, बुद्ध है, मुक्त है, किंतु अपरा प्रकृति से निर्मित शरीर, प्राण तथा मन के स्तरों में अनेक त्रुटियाँ, विकृतियाँ, अशुद्धियाँ  एवं विसंगतियाँ हैं ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि परा और अपरा प्रकृति से गठित मनुष्य की ‘त्रिधा-प्रकृति’ है । मनुष्य की त्रिधा-प्रकृति के कारण ही साधन-प्रणालियाँ  अथवा योग-मार्ग भी विभिन्न प्रकार और स्तरों में व्यवस्थित है । मनुष्य अपने जन्म-जन्मातरों के संस्कार-वश जिस स्तर पर होता है, तदनुसार ही वह उन साधन-प्रणालियों अथवा योग-प्रणालियों का अपनी साधना के लिये चयन करता है तथा साधना एवं योगाभ्यास द्वारा अपने स्तर से ऊपर उठकर आत्मा के सर्वोच्च स्तर की ओर आरोहण करता है । इसीलिये अध्यात्म प्राण भारत की परम पावनी उर्वराभूमि में नाना प्रकार की साधन-पद्धतियाँ अथवा योग-प्रणालियाँ प्रचलित है जो एक चढ़ती हुई क्रम-श्रृंखला में व्यवस्थित हुई नजर आती है । इस प्रमुख प्रचलित योग-प्रणालियों में विशेषकर हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा इनसे अधिक सशक्त एवं समन्वयात्मक तांत्रिक योग तथा उपरोक्त षट् प्रकार के योगों का अतिक्रमण कर जाने वाला सर्वांगपरिपूर्णता से युक्त ‘पूर्णयोग’ विशेष प्रचलित है । अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि इन विभिन्न योगों के उद्देश्य साधन-शैलियाँ तथा उपलब्धियाँ एवं संभाव्यताएँ क्या है तथा उनके अन्दर किन-किन बातों की कमी है ।

हठयोग

हठयोगी का सम्बन्ध  मनुष्य से प्रथम स्तर देह और प्राण से है । इस स्तर को शुद्ध कर अपने इस प्रथम एवं भौतिक आधार को शक्तिशाली बनाकर उसे वशीभूत करना ‘हठयोग’ का लक्ष्य है । शरीर और शरीर स्थित प्राण की शक्ति सीमित है । ‘प्राण में उतना ही वेग है जितने वेग के जोर से शरीर यहां सौ  वर्ष तक टिक सके l’ हठयोगी हठयोग की साधना के माध्यम से इस नियम का अतिक्रमण कर डालना चाहता है । वह पूर्ण स्वास्थ्य, अपरिमित बल, विक्रम, पराक्रम, और दीर्घ जीवन प्राप्त करना चाहता है। हठयोगी चांगदेव की आयुष्य चौदह सौ  वर्ष की थी, यह सर्वविदित है। उनकी अद्भुत सिद्धियों की बात से भी कोई अनभिज्ञ नहीं है। यह सब हठयोग के अभ्यास का परिणाम था। हठयोगी शरीर और प्राण पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सामान्य जीवन से ऊपर उठ जाना चाहता है। वह नाना प्रकार की कष्ट साध्य जटिल शारीरिक प्रक्रियाओं जैसे – आसन, प्राणायाम, बस्ती, धोती, बंध-मुद्रा आदि के माध्यम से शरीर को मल-रहित, निर्दोष बनाकर नाड़ी-मंडल को शुद्ध करता है, जिससे कि प्राणायाम की प्रक्रिया को ठीक प्रकार से सम्पन्न कर प्राण-वायु को संयत, नियंत्रित एवं वशीभूत किया जा सके । प्राण शक्ति को अपने वश में कर शरीर के द्वारा नाना प्रकार के अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कार्य किया जा सकते हैं। शरीर स्वास्थ्य, शक्ति और सौंदर्य से परिपूर्ण हो जाता है तथा अनिर्दिष्ट काल तक टिके रहने की शक्ति उसमें आ जाती है । हठयोगी अपने व्यष्टिगत प्राण का सम्बन्ध  प्रकृति की अक्षय विश्वव्यापिनी प्राण-शक्ति के महासागर से जोड़ लेता है , जिससे उस प्राण शक्ति की धारा अजस्र रूप से प्रवाहित होती हुई उसके अन्दर आने लगती है । इसके दबाव के बढ़ने से तथा प्राण – शक्ति के नियंत्रण से वैश्विक महाशक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली मनुष्य के देह में स्थित सुशुप्त कुंडली शक्ति जागृत होती है । इसके जागृत होते ही साधक में अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हो जाता है तथा अनेक प्रकार की सिद्धियाँ उसे उपलब्ध हो जाती है ।

इस प्रकार हठयोग के परिणाम देखने में अद्भुत तथा विशिष्ट प्रकार के होते हैं जो स्थूल तथा भौतिक मन पर प्रबल प्रभाव डालते हैं किंतु इतने अधिक कष्ट साध्य परिश्रम के उपरान्त उपलब्धि की दृष्टि से कुछ विशेष प्राप्ति नहीं होती । हठयोग की कुल उपलब्धि मात्र एक लंबी आयुष्य, सौंदर्यपूर्ण स्वस्थ जीवन एवं कतिपय असामान्य शक्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होती  इस सिद्ध अवस्था में पहुँचते-पहुँचते हठ योगी सिद्धियों के चक्कर में उलझ कर अपने लक्ष्य – स्थल भगवान् में सिद्ध होना भूल जाता है । ऐश्वर्य, शक्ति और सामर्थ्य तो वह पा लेता है, परन्तु सिद्धियों के फेर और मोह में पड़कर वह ऐश्वर्य के स्वामी भगवान को भूला बैठता है। भागवत संस्पर्श उसके देह और प्राण को तो मिल जाता है किंतु उसकी सत्ता के अन्य शेष और ऊपरी स्तर अर्थात् मन, बुद्धि, चिंतन एवं भावना के उर्ध्व क्षेत्र भागवत संस्पर्श को पाने से वंचित रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त हठयोगी की संपूर्ण जटिल और कष्ट साध्य क्रियाएँ समय और शक्ति की मांग करती है तथा साधक को लौकिक जीवन से पूर्णतया अलग होने को बाध्य कर देती है। हठयोग में पूरा जीवन खपा कर जो उपलब्धियाँ हठयोगी प्राप्त करता है वे सब और उससे भी अधिक उपलब्धियाँ कम-शक्ति और कम समय में अन्य योग प्रणालियों जैसे – राजयोग, तंत्रयोग आदि के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

राजयोग

राजयोग का स्तर हठयोग के स्तर से उच्चतर होता है; क्योंकि इसका सम्बन्ध  मनुष्य की सत्ता के प्रथम स्तर देह और प्राण से न होकर इसके ऊपर के उच्चतर द्वितीय स्तर मन के साथ होता है । जिस प्रकार हठयोगी अपने भौतिक उपादानों शरीर और प्राण को शुद्ध और शांत करना चाहता है उसी प्रकार राजयोगी भी मन को निर्मल, पवित्र और कल्मष रहित और शांत बनाना चाहता है ताकि आत्मा के साथ एकत्व प्राप्त किया जा सके । मन का आश्रय- स्थल तथा हमारी नाना प्रकार की वृत्तियों, भावनाओं और विचारों का उदय- स्थल हैचित्त यह चित-सागर सदैव लहराता ही रहता है । इसीलिये राजयोग मन के आश्रय-स्थल इस चित्त को ही अपना केंद्र बनाता है ताकि चित्त की वृत्तियों का निरोध कर मन को वश में किया जा सके । एतदर्थ राजयोगी अष्टांग प्रक्रिया अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अनुसरण करता है । यम अर्थात् नैतिक पवित्रता जो सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पालन से प्राप्त होती है तथा नियम अर्थात् आत्म- संयम जो अन्तर और बाह्य शुद्धि, संतोष, तपस्या, शास्त्राध्ययन और भागवत पूजा का फल है इनका पालन करके राजयोगी अपने मन के चांचल्य एवं प्रकृति के उच्छृंखल वेग को नियंत्रित कर लेता है तथा चित्त के विक्षोभ के दासत्व से बहुत कुछ मुक्त हो जाता है; क्योंकि मन के साथ प्राण और शरीर का भी सम्बन्ध  रहता है ‘ इसीलिये राजयोगी सहज, सरल एवं सुविधा युक्त आसन एवं प्राणायाम यथावश्यकता प्रयोग कर प्राणशक्ति की आधार सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत करने में समर्थ होता है । कुंडलिनी-शक्ति के जागृत होते ही चित्त पर पड़ा तम का आवरण हट जाता है, सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होती है, चित्त स्वच्छ, निर्मल एवं सत्व-प्रकाशक हो जाता है । इसके पश्चात् प्रत्याहार अर्थात् चंचल मन को स्थिर कर और उसके द्वारा आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया द्वारा ध्यान और समाधि के माध्यम से मन को शांत कर राजयोगी ऊपर उठता है और समाधि अवस्था में वह शांति प्राप्त करता है जो उसे मुक्ति तक पहुंचा देती है । राजयोगी की सिद्धि का यही अंतिम फल है । हठयोगी की तरह राजयोगी भी एकाग्रता, ध्यान और समाधि द्वारा सभी प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर सकता है पर हठयोगी की भाँति वह उन सिद्धियों के फेर में पड़कर वहीं नहीं उलझ जाता । परन्तु  राजयोगी की कमी यह है कि वह समाधि अवस्था को ही अधिक महत्व प्रदान करता है । वह जाग्रत अवस्था को अत्यन्त हीन समझकर अपने – आपको स्वप्न अथवा सुषुप्ति में ही लीन रखना चाहता है । राजयोगी की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह नैतिक शुद्धि पर ही योग का भवन खड़ा करना चाहता है , आध्यात्मिकता को  नैतिक शुद्धि पर आधारित करना चाहता है जबकि सत्य वस्तु तो यह है कि नैतिकता पर कभी भी आध्यात्मिकता निर्भर नहीं करती ; आध्यात्मिकता के विकास के साथ-साथ साधक में नैतिकता का उत्तरोत्तर विकास होते जाना स्वाभाविक ही है ; नैतिकता का विकास आध्यात्मिकता के विकास का स्वाभाविक परिणाम है ।

दोनों प्रणालियों की अपूर्णता

इस प्रकार हम देखते हैं किहठयोग और राजयोग दोनों में कुछ न कुछ अपूर्णताएं हैं । आध्यात्मिकता की प्राप्ति के लिये दोनों में जीवन को खोना पड़ता है और यदि जीवन को रखा जाता है तो आध्यात्मिकता की उपलब्धि नहीं होती । हठयोग में जिस प्रकार से हमारी सत्ता के प्रथम स्तर देह और प्राण को भागवत संस्पर्श मिलता है और सत्ता के शेष स्तर भागवत संस्पर्श को पाने से वंचित रह जाते हैं । उसी प्रकार राजयोग में हमारी सत्ता के द्वितीय स्तर मन को तो भागवत संस्पर्श मिल जाता है परन्तु हमारी सत्ता के शेष स्तर उस संस्पर्श को पाने से वंचित रह जाते हैं l अतः इन दोनों की योगों की विधियों को पूर्णतः आध्यात्मिक विधियाँ नहीं माना जा सकता ।

वेदांतिक योग एवं योगत्रयी

(ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोग)

जिस प्रकार से हठयोग का केंद्र है हमारी सत्ता का सबसे निचला स्तर स्थूल शरीर और प्राण तथा राजयोग का केंद्र है इससे ऊपर का स्तर सूक्ष्म शरीर, उसी प्रकार योगत्रयी अथवा मार्गत्रयी या वेदांतिक योग का केंद्र है आत्मा जीव या पुरुष । निश्चित ही ज्ञान, भक्ति और कर्म राजयोग के परवर्ती स्तर में है । राजयोग के द्वारा हमारे सत्ता के जो प्रदेश अविजित रहे हैं उन्हीं को अधिगत करने का प्रयत्न त्रियोग अर्थात् ज्ञानयोग, भक्तियोग, तथा कर्मयोग करता है । वह (त्रियोग) मन के तीन प्रमुख केन्द्रीय तत्वों को अर्थात् बुद्धि, हृदय तथा संकल्प-शक्ति को चुनकर उन्हें ही भगवान पर केन्द्रित करके, उन्हें भागवत संस्पर्श में लाकर उनके रूपान्तरण के द्वारा समग्र मनुष्य को रूपान्तरित करना चाहता है । परन्तु इसके लिये वह राजयोग की तरह शरीर और मन की शुद्धि हेतु आसन, प्राणायाम जैसी जटिल एवं क्लिष्ट साधना की प्रक्रियाओं को नहीं स्वीकारता । त्रियोग का भी एकमात्र उद्देश्य इस परिवर्तनशील जगत् और जीवन से मुक्ति प्राप्त करना है । जिस साधक में जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारानुसार जिस केन्द्रीय तत्व बुद्धि, ह्रदय एवं संकल्प शक्ति की प्रधानता होती है वह उसी के अनुसार ज्ञानयोग, भक्तियोग अथवा कर्मयोग की ओर प्रवृत्त होती है ।

ज्ञानयोग

जिस प्रकार से राजयोग का केंद्र है मन का आश्रय स्थल चित्त, उसी प्रकार ज्ञानयोग का केंद्र है बुद्धि । मानव में जो ज्ञान-जिज्ञासा-वृति है, उसको लेकर ही ज्ञानयोग चलता है । यह बौद्धिक चिंतन, सद्-असद् का विवेक करता हुआ विचार की प्रणाली के माध्यम से ध्यान और आत्मनिरीक्षण के द्वारा आत्म-केंद्र में पहुंचता है । वह हमारी दृश्यमान सत्ता के विभिन्न खण्डों स्तरों एवं तत्वों का निरीक्षण करता है तथा उन्हें अपने से अलग करता हुआ नामरुपात्मक जगत् से अपने को सर्वथा अलग कर लेता है । वह पँचतत्व, पंचीकरण, तन्मात्रा आदि का संश्लेषण एवं विश्लेषण करता हुआ अपने सच्चे एवं वास्तविक स्वरूप को पाकर उसमें निमग्न हो जाता है ।

ज्ञानयोगीमैं कौन हूं? कि थाह पाने के लिये गहराई में उतरता चला जाता है । ‘मेरा शरीर, मेरा प्राण, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरे विचार आदि प्रकार से निरीक्षण करता हुआ अपने वास्तविकमैं अर्थात् सत्य’ की झांकी पा लेता है । इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते उसके अन्दर विवेक की जाग्रति हो जाती है जिसके प्रकाश में उसे यह सत्य बोध हो जाता है कि ‘यह शरीर, प्राण, बुद्धि, मन, विचार आदि मेरे हैं मैं यह सब नहीं हूं ; मैं इन सब से अलग नाम- रुपात्मक जगत् से अलग, सबसे परे शुद्ध-बुद्ध ; ‘मैं हूँ’ ; मैं आत्म स्वरूप हूँ, आत्मा हूँ । ’ जब ज्ञानयोगी में यह बोध स्थायी रूप से प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसकी सारी बाह्य प्रतीति नष्ट हो जाती है । और उसकी व्यक्तिगत आत्मा सर्वोच्च सत्ता में अंतिम रूप से लीन हो जाती है और फिर वहाँ से नहीं लौटती। साधक कैवल्य को, ब्रह्म सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘ज्ञानयोग’ साधक को ‘तुरीय अवस्था’ में ले जाकर स्थित कर देता है जहां उसे साक्षात्कार हो जाता है अपनी गभीरतम उस आत्मवस्तु का जो एक असीम, अखंड, अनिर्वचनीय, पूर्ण, शाश्वत और सनातन है । परन्तु इस ‘कैवल्य मुक्ति’ के लिये वह जगत् के साथ सर्वदा सम्पर्क – शून्य हो बैठता है, जीवन को मिटा बैठता है, उस ‘एक’ को पाने के लिये, उस ‘एक’ के ही बहुत्व को खो बैठता है l  सत्य के मूल को तो वह पा लेता है , परन्तु उसी सत्य के शाखा-प्रशाखा, फल-फूल-समन्वित वृक्ष अर्थात् इस जगत् को वह भुला बैठता है l इस योग में भी हमारी सत्ता के ‘बुद्धि–केंद्र’ को तो भागवत संस्पर्श मिल जाता है, परन्तु इसके नीचे समस्त निचले स्तर उस संस्पर्श से लाभान्वित नहीं हो पाते । बुद्धि की उपलब्धि का लाभ उसके निचले क्षेत्र में स्थित मन और शरीर नहीं उठा पाते । यही ज्ञानयोग की बड़ी भारी कमी है ।

भक्तियोग

जिस प्रकार से राजयोग का केंद्र है मन का आश्रय स्थल चित्त और ज्ञानयोग का केंद्र है बुद्धि, उसी प्रकार भक्तियोग का केंद्र है मनुष्य का हृदय, उसकी प्रेम – वृत्ति का केंद्र, उसको परिचालित करने वाला केंद्र । मनुष्य की इस केन्द्रीय वृत्ति प्रेम को भागवत संस्पर्श देकर यदि दिव्य प्रेम में रूपान्तरित कर दिया जाय तो समुचा मनुष्य रूपान्तरित हो जायेगा । इसी मान्यता के आधार पर भक्तियोग ने पकड़ा है मनुष्य के केन्द्र – स्थल उसके हृदय को । इसीलिये भक्तियोग सर्वोच्च प्रेम और उसे प्रेम के द्वारा प्राप्त आनन्द के उपभोग को अपनी उपलब्धि का सर्वोच्च उद्देश्य मानता है ।

भक्ति-योग ने भगवान को मनुष्य के लिये उसी के रूप में, उसी के धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है ; केवल अपरिचित – सा खड़ा ही नहीं कर दिया है अपितु उसे उसका निकटतम और प्रियतम सम्बन्धी भी बना दिया है, किसी का पिता तो, किसी का पुत्र, किसी की माता, तो किसी का बंधु, किसी का सखा तो, किसी का स्वामी, किसी का प्रभु तो किसी का प्रियतम l  इन संबंधों में से जो भी आपको रुचे और जो भी आपको केन्द्रीय प्रेम-प्रवृत्ति के अनुकूल हो, इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर लीजिये उसके साथ और पा लीजिए उसे उसी रूप में । गीता में की गई उद्घोषणा के अनुसार –  “यो मां यथाप्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् l” इस प्रकार से भक्तियोग भगवान को कोई अनधिगम्य तत्व नहीं मानता । भक्त – शिरोमणि प्रहलाद, माता यशोदा, रामकृष्ण परमहंस, द्रौपदी, अर्जुन, भक्तराज हनुमान, राधा आदि ने इसी प्रकार के सम्बन्ध स्थापित कर उसे पा लिया था ।

भक्तियोग के अनुसार भगवान निर्गुण, निराकार, अतीन्द्रिय और शारीरिक नहीं है । उन्हीं का आनंद विग्रह इस स्थूल जगत् के रूप में लीला-विलास के लिये अभिव्यक्त हुआ है । इस प्रकार की मान्यता एवं धारणा के अनुसार भक्त जगत् को अस्वीकार नहीं करते । वे उसे भगवान् की रासलीला का स्थूल आश्रय मानकर उसी भाव में और इसी रस में निमग्न हो जाते हैं और भागवत आनन्द के प्रवाह में अपने को बिल्कुल ढीला छोड़ देते हैं तथा भाव प्रवणता एवं उसकी पूर्णता की स्थिति में साधारण जगत् से दूर हटते चले जाते हैं तथा उसे विश्वातीत भगवान के अन्दर डूब जाने की चेष्टा करते हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि यह मार्ग भी मनुष्य को जगत् के अस्तित्व से दूर परात्पर तत्व में लीन होने की अवस्था तक ले जाता है । इस योग में भी भागवत संस्पर्श हमारी सत्ता के हृदय केंद्र को तो मिल जाता है परन्तु शेष स्तर इस संस्पर्श को पाने से वंचित रह जाते हैं ।

कर्मयोग

ज्ञानयोग को भक्तियोग की तरह कर्मयोग भी मनुष्य के आध्यात्मिक वृत्ति के ऊपर प्रतिष्ठित है । मन के जो तीन प्रमुख केन्द्रीय तत्व है – बुद्धि, हृदय तथा संकल्प शक्ति अथवा इच्छा-शक्ति उनमें से यह संकल्प शक्ति अथवा इच्छा-शक्ति पर आधारित है । कर्मयोगी अपनी इसी संकल्प-शक्ति को अपने कर्मयोग की साधना के केंद्र के रूप में चयन करता है तथा इसी केंद्र को भागवत संस्पर्श  प्रदान कर उसके माध्यम से समूचे मनुष्य को रूपान्तरित करना चाहता है ।

कर्मयोगी की धारणा के अनुसार भगवान ही विराट कर्मी है । अतएव वह अपने कर्म-जीवन के द्वारा अपने समस्त कर्मों को, उनके कर्मफल को तथा अपने कर्तव्य अभिमान को त्याग कर इन सबको कर्मों के स्वामी और महान् कर्मी को समर्पित कर देता है । उसका यह समर्पण उसकी संकल्प शक्ति अथवा इच्छा शक्ति का परिष्कार कर देता है । ज्यों-ज्यों यह परिष्कार की प्रक्रिया बढ़ती जाती है , त्यों- त्यों साधक की सचेतनता भी बढ़ने लगती है , उस विराट भागवती शक्ति के प्रति जो संचालन-रता है । व्यष्टि-प्रकृति के द्वारा इस विराट विश्वजीवन के विभिन्न  कर्मों की । और इस प्रकार कर्मयोगी उन परम प्रभु का ज्ञान प्राप्त कर उनके साथ युक्त हो जाता है ।

कर्मयोग के साधक को पूर्णत्व की दशा में पहुंचते-पहुंचते तीन अवस्थाओं से गुजरना होता है – प्रथम अवस्था में उसे प्रत्येक कर्म प्रभु – प्रीत्यर्थ करना होता है । अपने प्रत्येक कर्म को एवं तज्जन्य कर्म-फल को तथा कर्तत्वाभिमान को भगवान् के चरणों में समर्पित करना होता है । ऐसा करते-करते अहं लय  होने लगता है, जिसके परिणामस्वरुप कर्म में निष्कामता आ जाती है तथा साधक फलाकांक्षा से मुक्त हो जाता है ।

दूसरी अवस्था में पहुंचते – पहुंचते उसे यह अनुभूति हो जाती है कि वह भगवान के हाथ का यंत्रमात्र है । स्वयं भगवान ही उस यंत्र का उपयोग कर रहे हैं , इस अवस्था में साधक अकर्त्ता, दृष्टा एवं साक्षीपुरुष हो जाता है जो यह देख रहा होता है की प्रकृति ही सब कुछ कर रही है ।

तीसरी अवस्था में भगवती शक्ति की पूर्ण प्रेरणा साधक में क्रियाशील हो उठती है; तब उसकी व्यष्टि प्रकृति बन जाती हैविश्व-प्रकृति और उसकामैं मिल जाता है उस विराट कर्मीपरम पुरुष में । यही कर्मयोगी की चरम एवं परम परिपूर्णता की सिद्ध अवस्था है । इस परिपूर्णता की स्थिति में उसे सिद्ध कर्मयोगी के माध्यम से वह विराटकर्मी ही कर्म कर रहा होता है ।

इस प्रकार से कर्मयोगी भगवत्-प्रेरणा से होने वाले कर्मों में अपने अहं भाव को पूर्णतया लय करते हुए संकल्प-रहित होकर, प्रभु-प्रेरित शक्ति को अपने अन्दर कर्म करने देता हुआ ‘सर्व कर्मत्यागी’ की स्थिति में स्थित ‘योगारूढ़’ होकर ‘त्रिगुणातीत’ होकर उस विश्वातित में लीन हो जाता है ।

अन्य योग मार्गों की तरह कर्मयोग भी दृश्यमान अस्तित्व से मुक्ति पाने और सर्वोच्च सत्ता में प्रवेश करने के लिये ही किया जाता है । इस योग में भी साधक की संकल्प-शक्ति या इच्छा-शक्ति से केंद्र को तो भागवत संस्पर्श मिल जाता है । परन्तु उसके अन्य स्तर उससे वंचित रह जाते हैं ।

तांत्रिक -योग

हठयोग, राजयोग, त्रियोग आदि सभी योगों को यदि अत्यन्त बारीकी से परखा जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इनमें से प्रत्येक के मूल में ज्ञान की ही प्रधानता होने से उनके अनुसार एकमात्र ज्ञान ही उपाय है और आत्मा अथवा पुरुष ही लक्ष्य है और इसके साथ मुक्त हो जाना ही योगसिद्धि है ।

परन्तु तांत्रिक योग इन सब योगों से अधिक सशक्त एवं समन्वयात्मक प्रणाली है । इस योग में साधक  का स्थान लेती है ‘प्रकृति’ और उपाय होता है ‘शक्ति’ ।

वेदांतिक साधकों की धारणानुसार प्रकृति स्वयं जड़ है । इसमें चेतना को जो आभास होता है वह चैतन्य पुरुष के संस्पर्श के कारण होता है । इसके विपरीत तांत्रिक साधकों की मान्यता अनुसार प्रकृति का मूल स्वरूप है चिन्मयी  । यह चिन्मयी प्रकृति ही जगत् का, सृष्टि का, आदिकारण है । यह प्रकृति दिव्य है, चिन्मय है, अनन्तगुण महान् है, शक्ति स्वरूप है ।  तांत्रिक योग के अनुसार वेदांत की जो त्रिगुणमयी माया है वह इस मूल आद्याशक्ति की, इस तप: शक्ति की, लीला की केवल एक प्रक्रिया है, इस चिन्मयी शक्ति की केवल अपरागति है । इसीलिये जबकि अन्य योगों के साधक प्रकृति को ‘मायामयी’ मान अपने को विश्व-लीला से अलग कर लेते हैं , तांत्रिक योगी प्रकृति को चिन्मयी मानकर अपने-आपको पूर्णतया उसीकी प्रेरणा पर छोड़ देते हैं । उनके लिये प्रकृति की विश्वलीला असत्य नहीं , अपितु परम आनंदमयी है ; इसीलिये पूर्णतया निडर और निर्भय होकर खूब खुलकर वह प्रकृति का आलिंगन करते हैं । वे आत्मा को पाने के लिये शक्ति को या सक्रिय ब्रह्म को विश्वात्मिका शक्ति को सबसे अधिक महत्व प्रदान करते हैं ।

तांत्रिक योग में शक्ति ही सर्व प्रधान है; वही आत्मा की खोज की कुंजी बनती है । यह निचले तल से प्रारम्भ करती है और आरोहण की सीढ़ी पर ऊपर की ओर पग रखती हुई शिखर तक पहुंचती है । सबसे पहले हठयोग और  राजयोग को सम्मिलित विधि द्वारा शरीर और उसके स्नायु-केंद्रों, चक्रों में से सबसे नीचे के मूलाधार चक्र में चक्राकार सोई हुई वैश्विक-शक्ति (cosmic force) का मानव शरीर में प्रतिनिधित्व करने वाली कुंडलिनी शक्ति को जगाती है तथा षटचक्र – भेदन की क्रिया द्वारा एक के बाद एक समस्त आध्यात्मिक चक्र को खोलती हुई , उसे सहस्त्रार में ले जाकर साधक को शिव – शक्ति के मिलन का अलौकिक आनंद प्रदान करती है ।

श्रीअरविन्द के शब्दों में-यह प्रणाली योग के लक्ष्यों में उस मुक्ति को ही समाविष्ट नहीं करती जो विशेष पद्धतियों का एकमात्र सर्व प्रधान लक्ष्य है , बल्कि आत्मा की शक्ति के विश्वगत उपभोग (मुक्ति) को भी समाविष्ट करती है जिसे अन्य पद्धतियां मार्ग में प्रासंगिक, आंशिक और नैमित्तिक रूप से तो स्वीकार कर सकती है पर जिसे वे अपना हेतु एवं लक्ष्य बनाने से कतराती है इस प्रकार  तांत्रिक-साधना एक अधिक साहसपूर्ण एवं विशालतर प्रणाली है

पर इतना सब कुछ होते हुए भी तांत्रिक-साधना सर्वसाधारण के बस की बात नहीं,  सामान्य मनुष्य के लिये यह एक दुरुह साधना है । इस तांत्रिक योग मार्गी को सत्य का केवल अर्धांश ही प्राप्त हो पाता है,  क्योंकि तंत्र ने सत्य के विरुद्ध शक्ति को जो खड़ा कर रखा है । इसका परिणाम यह हुआ है कि तांत्रिकों ने उपाय को ही अर्थात् ‘भोग’ को ही प्रधानता दे दी है और ‘सत’ को खोकर अपने भोग के प्रबल प्रभाव में प्रवाहित हो जाने दिया है । फलस्वरुप समाज में कलुषित आचरण करने वाले वाममार्गियों की सृष्टि हो पड़ी ।

श्रीअरविन्द का पूर्णयोग –

उपरोक्त समस्त परम्परागत योगों के उद्देश्य साधन शैलियाँ, उपलब्धियाँ आदि कुछ भी क्यों न हो उनके सूक्ष्म निरीक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्त लोकों  में ‘समाधि’ ही एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा मन को लय और साधक की अन्तरात्मा सच्चिदानन्द के लोकों में पहुंचकर परमात्माभिमुख होती रही है । परन्तु  अभी-अभी ही वर्तमान युग में मानवजाति को एक सर्वांग परिपूर्णता युक्त अभिनव योग भी प्राप्त हुआ है, जिसका माध्यमसमाधि नहीं है, जिसमें मन को लय न कर सचेतन रूप से सच्चिदानन्द के लोकों में प्रवेश पाया जा सकता है । न केवल प्रवेश ही पाया जा सकता है, अपितु सच्चिदानन्द लोक से ठीक नीचे स्थित अतिमानस लोक की विज्ञान-चेतना को मन, प्राण तथा शरीर के अधोलोकों में उतारकर उसके द्वारा इन सबका रूपान्तरण भी साधित किया जा सकता है । इस प्रकार से इस सर्वांग परिपूर्णतायुक्त योग- प्रणाली का लाभ साधक की सत्ता के समूचे अंगों को तो प्राप्त होता ही है , जगत् और जागतिक-चेतना पर भी उसका रूपांतरकारी प्रभाव पड़ता है । इसके विपरीत अन्य समस्त परम्परागत योगों एवं आध्यात्मिक साधनाओं का परिणाम केवल व्यष्टिगत, वैयक्तिक मुक्ति, मोक्ष अथवा निर्वाण की स्थिति की उपलब्धि तक ही सीमित रहता है, उससे जगत् और जागतिक चेतना का रूपान्तरण संभव नहीं । यह अभिनव योग, जिसमें अभी तक की अन्यान्य योग-प्रणालियों के सार भाग का समन्वय एवं सामंजस्य तथा स्वयं की अपनी एक सर्वांग परिपूर्णतायुक्त विशेषता भी है , पूर्णयोग अथवाअतिमानसिक योग के नाम से अभिहित किया जाता है ।

अतिमानसिक योग अपने बहु आयामों में –

इस पूर्णयोग के प्रवर्तक हैं, विश्ववंद्य श्रीअरविन्द जो वर्तमान युग के महर्षि हैं , दिव्य दृष्टा है भावी अतिमानसिक युग के स्रष्टा हैं और हैं सर्वोपरि उस पूर्णपरात्पर तत्व की निर्णायक क्रिया के माध्यम । उन्होंने अपनी दीर्घकालीन योग-साधना और उसकी संसिद्धि से दु:खी, संतप्त, संत्रस्त, निराशा एवं अनेक समस्याओं से ग्रस्त मानवजाति को एक ऐसा दिव्य दर्शन प्रदान किया है जिसने युगों से व्याप्त घोर निराशावादी परम्परा का अन्त कर इस धरा के गर्भ में एक सबल सार्वभौमिक आशावाद के बीज का वपन कर दिया है जिसका सुफल भावी मानव-जाति के लिये सुनिश्चित है । योग व अध्यात्म के क्षेत्र में सृष्टि के आदि से लेकर आज तक मानव-जाति ने जो कुछ भी अर्जित किया है, श्रीअरविन्द  की उपलब्धि उस सबसे आगे की है । और यही कारण है कि अधिकांश लोग श्रीअरविन्द  के दर्शन को अत्यन्त ही क्लिष्ट, अगम्य, दुरूह एवं दुर्बोध मान बैठे हैं । जहां तक वे वेद, उपनिषद, गीता तथा विश्व के अन्यान्य दर्शनों के तारतम्यानुसार चलते हैं वहां तक तो वे सभी की समझ में आ जाते हैं । परन्तु  ज्यों ही वे उन सबकी अंतिम सीमा उन सबके अंतिम लक्ष्य का अतिक्रमण कर निर्वाण के महासागर को लांघकर उसकी सीमा के भी परे पहुंचकर अभी तक के अनदेखे और अभी तक के अनचले मार्ग पर चलकर परम दिव्य प्रदेश का संदेश देने लगते हैं , तभी वे दुर्बोध एवं दुरुह से प्रतीत होने लगते हैं ।

श्रीअरविन्द के पूर्णयोग की एक स्पष्ट धारणा बन सके, एतदर्थ उनके द्वारा स्पष्टीकृत कतिपय तथ्यों को समझ लेना अत्यावश्यक होगा । वैज्ञानिकों की भांति श्रीअरविन्द भी विकासवाद के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं । परन्तु वे इसके विषय में दो निर्णायक एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हैं । प्रथम तो यह कि यह जो जड़ से प्राण और प्राण से मन और मन से सचेतन चेतना बुद्धि विकसित हुई , इसका अर्थ यह हुआ कि विकास की प्रत्येक अगली अवस्था का बीज उसके पूर्व की अवस्था में और पूर्वतर अवस्था और पूर्वतम अवस्था में अन्त-र्निहित था । सिद्धांत है कि ‘नास्ति से अस्ति का जन्म नहीं हो सकता । ‘ वही चीज विकसित हो सकती है, जिसका बीज पूर्व से ही उसके पूर्व वाली अवस्था में अन्त-र्निहित हो । सचेतन चेतना के सम्बन्ध  में भी यह सिद्धांत लागू होता है । इस सचेतन चेतना का बीज मन में, सचेतन चेतना सहित मन का बीज प्राण में और सचेतन चेतना एवं मन सहित प्राण का बीज जड़ में अन्त-र्निहित होने से ही इस प्रकार का श्रृंखलाबद्ध विकास-क्रम संभव हो सका । एक मात्र ‘चेतना’ ही इन सबको जोड़ने वाला तंतु है । सृष्टि के अस्तित्व के मूल में चेतना ही मौलिक तत्व है । जड़तत्व और कुछ नहीं , चेतना का निश्चेतन रूप है । यह सृष्टि और जगत् और कुछ नहीं इस अन्त-र्निहित चेतना का ही क्रमिक उद्घाटन अथवा उद्विकास है । उनके अनुसार यह सर्व चैतन्य आत्मा ही है जो अचित् की महानिशा में उतरती चली गई । ऊपर से नीचे की ओर चेतना के सप्त सोपानों –सत्यम् , तपः , जनः , मह: , स्व: , भुवः और भू: – को बनाती हुई , और जब और नीचे जाने को मार्ग नहीं रहा तो वहीं से लौट पड़ी , उन्हीं सोपानों भू: , भुवः , स्व: , मह: , जनः , तपः और सत्यम्पर उर्ध्वारोहण करती हुई । उसका यह उर्ध्वारोहण ही उद्विकास का कारण बना । इस प्रकार प्रथम आत्मा का निवर्त्तन अथवा अन्तर्वलन या व्यावर्त्तन (involution) घटित होने के पश्चात् ही उसका विवर्तन अथवा उद्विकास का उत्क्रमण (Evolution)  उसी श्रेणी क्रम से प्रारम्भ होकर जड़ से विकसित होकर प्राण तक और प्राण से विकसित होकर मन तक ही पहुंच पाया है अर्थात् चेतना का उर्ध्वारोहण भूः (जड़) से प्रारम्भ होकर भूवः (प्राण) के सोपान पर चढ़ता हुआ अभी स्वः (मन) के सोपान तक ही पहुंच पाया है ।

इस उर्ध्वारोहण करती हुई चेतना ने एक-एक सोपान पर अभी केवल जड़ जगत्, वनस्पति जगत्, पशु जगत् और मानव जगत् क्रम-क्रम से प्रार्दूभूत   किया है । अभी तो उसके उर्ध्वारोहण के महः से लेकर सत्यम् तक के चार सोपान और शेष है । श्रीअरविन्द की दिव्य दृष्टि का कथन है कि चेतना के अगले सोपान महः (अतिमानस) का है । चेतना के सोपान पर पहुंचते ही विकास की अगली अवस्था ‘अतिमानसिक अवस्था’ होगी और इस विकास के साथ ही इस पृथ्वी पर नई जाति प्रकट हो जायेगी  । जो मनुष्य से ठीक उसी प्रकार आगे होगी जिस प्रकार पशु से मनुष्य आगे हैं । इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य तो इस विकास-क्रम में एक मध्यवर्ती सत्ता है । इस मध्यवर्ती सत्ता ‘मानव’ के आगे की ओर उससे उच्चतर एवं श्रेष्ठतम सत्ता ‘अतिमानव’ का प्राकट्य अब सन्निकट एवं सुनिश्चित है । इस अतिमानसिक विकास का एक अत्यन्त ही शांतिदायी एवं आनंददायक परिणाम यह होगा कि यह चतुर्युगी का काल-चक्र सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग – जो अनन्त युगों से अबाधगति से चलता रहकर इस सृष्टि के भाग्य को अत्यन्त निर्दयतापूर्वक पीसता रहा है , सदैव के लिये रुक जायेगा और एक ऐसा सतयुग इस द्वार पर उतरकर व्याप्त हो जायगा, इसके बाद न कोई त्रेता आयेगा, न द्वापर और न कलियुग ही ।

 दूसरी निर्णायक बात जो श्रीअरविन्द बतलाते हैं वह यह है कि विकसित होती हुई यह चेतना हर नये स्तर पर न केवल ऊपर उठती है, अपितु ऊंचे स्तरों पर विकसित होकर अपने पूर्व के पार किये हुये स्तरों को भी उस आगे के विकास की उच्च अवस्था की शक्ति से प्रभावित करती है । और उन्हें नया स्वरूप प्रदान करती है । श्रीअरविन्द की योग-दृष्टि का कथन है कि यह विकास क्रम का स्तर जो अतिमानसिक अवस्था में पहुंचने जा रहा है, अपने नीचे के समस्त स्तरों को अपनी रूपान्तरकारिणी अतिमानसिक शक्ति से प्रभावित कर उन्हें एक नव्य एवं दिव्य स्वरुप प्रदान करेगा । मनुष्य तक का विकास प्रकृति की एक अ-सचेतन क्रिया थी किंतु मनुष्य में चेतना है वह सचेतन हो गया है इसलिये अब अतिमानसिक विकास सचेतन रूप से होगा । अब विकास की प्रक्रिया में दो इंजन लग गए हैं – एक तो प्रकृति स्वयं विकसित हो रही है, मन के विकसित हो जाने से या विकास की प्रक्रिया अचेतन से अब संकल्प युक्त एवं सचेतन हो उठी है l अब शताब्दियों एवं अनेक जन्मों में सम्पन्न होने वाला कार्य केवल कुछ ही समय में अथवा एक ही जन्म में हो सकता है । श्रीअरविन्द  का कथन है कि – जाने-अनजाने सारी प्रकृति ही योग कर रही है और इसीलियेसारा जीवन ही योग है l”

यहां अतिमानसिक चेतना के सम्बन्ध में अत्यन्त संक्षेप में समझ लेना प्रासंगिक न होगा l  यह चेतना सच्चिदानंद के ठीक नीचे की चेतना है , यहां पूर्ण एकत्व है, विभाजन नहीं; यह पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनंद, तथा पूर्ण शांति का स्तर है। इस केंद्र में पहुंच जाने पर रोग, शोक, संत्रास, संताप, पारस्परिक बैर, विरोध आदि स्पर्श नहीं करते । क्योंकि यह सब मन के निचले क्षेत्र की चीजें हैं । और इसीलिये ये वहीं छूट जाती है । यह पूर्ण प्रकाश एवं शाश्वत शांति का स्तर है ।  यहां ज्ञान का शाश्वत सूर्य सदा उदित रहता है ।

विश्व में तथा मानव में भगवान की परा और अपरा दोनों प्रकार की प्रकृतियों के स्तर परस्पर गुम्फित है । श्रीअरविन्द के अनुसार इन दोनों प्रकृतियों में निर्मित मानव व्यक्तित्व चेतना के सप्तलोकों में विभक्त है । परा प्रकृति से निर्मित उर्ध्वलोक (Upper Hemisphere) अथवा परार्ध के नीचे ऊपर चार सोपान है जिन्हें अध्यात्म की भाषा में अतिमानसकलोक आनंदलोक, चित्तलोक तथा सतलोक कहा गया है । और जो भागवत चेतना के लोक हैं तथा जो हमारी इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के लिये अगम्य है । अपरा प्रकृति से निर्मित अधोलोक  (Lower Hemisphere) अथवा अपरार्ध के भी नीचे से ऊपर तीन सोपान है जिन्हें जड़ या शरीर, प्राण तथा मन कहा जाता है l यह तीनों अपरा प्रकृति के या विश्व प्रकृति के या व्यक्त जगत् के लोक हैं जिनमें रात-दिन हम विचरण करते रहते हैं । चेतना ही एक ऐसा मध्यवर्ती तंतु है जो इन दो गोलार्धों को जोड़ता है । इसी चेतना का ऊपर का सर्वोच्च छोर सत् है तथा नीचे का छोर असत् है । इस अधोलोक तथा  उर्ध्वलोक के बीच एक सुनहरी पट्टी अथवा क्षेत्र है जिसे अधिमानस (Over Mind) की संज्ञा दी गई है । यह मन का सर्वोपरी शिखर है । मन तथा अधिमन के बीच में भी नीचे से ऊपर की ओर चढ़ते हुए तीन मध्यवर्ती स्तर और है । जिन्हें उच्च मन (Higher Mind) आलोकित मन(Illumined Mind) तथा संबोधि मन (Intuitive mind)  कहा जाता है । मन का सर्वोपरि शिखर अधिमानस स्वयं ज्योतिर्मय होने पर भी पूर्ण, अखंड अतिमानसिक ज्योति को हमसे दूर रखता है । वह स्वयं निश्चय ही अतिमानस पर निर्भर करता है , पर ज्योति को ग्रहण करते समय इस पृथक-पृथक भावों, शक्तियों, सभी प्रकार के बहुत्वों में विभक्त कर वितरित कर देता है । अधिमानस की इस क्रिया के लिये उपनिषद् का यह वाक्य प्रयुक्त हो सकता है कि – “सत्य का मुख एक सुनहरे ढक्कन से छिपा हुआ हैहिरमण्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं अथवा वेद का यह वचन प्रयुक्त हो सकता है –ऋतेन ऋतमपिहितं l”

आदिकाल से ही हमारे ऋषि, महर्षि, योगी एवं उच्च – कोटि के साधक सच्चिदानन्द के उर्ध्व लोकों में प्रवेश पाने के लिये प्रयत्नशील रहे हैं तथा प्रवेश पा लेने में सफल भी हुए हैं । परन्तु एतदर्थ उन्हें मन को मूर्च्छना में डालना पड़ा है ,  मन को निष्क्रिय एवं लय करना पड़ा है , मन को यहीं छोड़ना पड़ा है और तभी चित्तवृत्ति का निरोध कर वे ‘समाधि’ के माध्यम से रोग, शोक, संत्रास, संघर्ष, जरा-मृत्यु आदि के निम्न लोकों से छुटकारा पाकर अनन्त शांति, ज्योति, आनंद, अमृत, प्रेम आदि के उर्ध्व लोकों में अर्थात् सच्चिदानन्द के दिव्य लोकों में प्रवेश कर सके हैं । मन की निष्क्रिय अवस्था में साधक की अन्तरात्मा परमात्माभिमुख होकर उसमें लीन होने की दिशा में अर्थात् ‘निर्वाण’ या ‘मोक्ष’ की ओर बढ़ सकती है । किंतु समाधि द्वारा प्राप्त साधक को इस सर्वोच्च सिद्धि अथवा उपलब्धि का लाभ उसके मन, प्राण तथा शरीर को नहीं मिल पाता । और जब स्वयं साधक की ही समूची सत्ता उसकी उपलब्धि से लाभान्वित नहीं हो पाती तो इस परम्परागत समाधि के माध्यम से समूची मानवजाति का भाग्य कैसे पलटा जा सकता है समूचे जागतिक जीवन और जागतिक चेतना पर उसका रूपान्तरकारी प्रभाव कैसे संभावित हो सकता है ? यह एक प्रकार की खण्डसिद्धि ही है, अखण्ड नहीं, इसीलिये श्रीअरविन्द को समाधि द्वारा प्राप्त की जाने वाली यह खण्डसिद्धि संतुष्ट न कर सकी । उन्हें प्राचीन युग से उनके प्रादुर्भूत होने के पूर्व तक का समस्त प्रकार के योग एवं आध्यात्मिक साधनाओं का सर्वोच्च माना जाने वाला लक्ष्य ‘वैयक्तिक मोक्ष’ अथवा ‘निर्वाण’ अपेक्षाकृत छोटा लगा । इसीलिये उन्होंने ‘समाधि’ को जगत् और जीवन के दिव्य रूपान्तरण की प्रक्रिया के लिये एक निरर्थक प्रयास माना; क्योंकि उनका लक्ष्य व्यक्तिगत मोक्ष अथवा आत्मा का परमात्मा से मिल जाना और व्यक्तिगत पूर्णता भर प्राप्त करना तो था ही नहीं । उनका लक्ष्य था उस जगत् नियंता को इस स्थूल अन्नमय जगत् में प्रकट कर समूची मानवजाति का दिव्य रूपान्तरण साधित करना । उनके योग का ध्येय है जीवन का आमूलचूल रूपान्तरण, जीवन का दिव्यीकरण अर्थात् जीवन में दिव्य बनना और जीवन को भी दिव्य बनाना, जड़ पदार्थ तक को चिन्मय बना देना । इसीलिये निर्वाण के महासागर को लांघकर वे आगे बढ़ते ही चले गये पूर्ण और सर्वोच्च सत्य की शोध में, अखंड सिद्धि की प्राप्ति के लिये, काल-कवलित बनी पड़ी मानवजाति के परित्राण के लिये, उसे जरा-मरण, रोग, शोक, संत्रास से छुटकारा दिलाने के लिये और अन्त में उर्ध्वलोक (Upper Hemisphere) एवं अधोलोक (Lower Hemisphere) के मध्य में स्थित ‘सुनहरी पट्टी’ पर पहुंचकर उन्होंने अपनी विशिष्ट प्रकार की साधना के माध्यम से मन को बिना लय किये ही उसको सचेतन रूप से साथ में रखकर अतिमानस एवं सच्चिदानन्द के लोकों में प्रवेश पा लिया । उन्होंने न केवल सच्चिदानन्द के लोकों में प्रवेश पा लिया; अपितु उर्ध्वलोक एवं अधोलोक, मन और अतिमानस के मध्य स्थित खाई को पाटकर एक ऐसे सचेतन पुल का, एक ऐसे राजमार्ग का निर्माण कर दिया जिससे साधना मार्ग में अग्रसर होने वाले प्रत्येक अभीप्सु के लिये आवागमन का यह मार्ग खुल गया । अभी तक की योग-साधनाओं में चेतना के केवल आरोहण (Ascent) का योग था । किंतु श्रीअरविन्द ने अपनी साधना के माध्यम से मानवजाति को अधिमानसिक चेतना के अवरोहण (Descent) का एक अभिनव योग दिया, जिससे पृथ्वी पर स्थायी रूप से सत् आ जाय, जगत् का रूपान्तरण हो जाय और वह दिव्य बन जाय । योगी की यह दोहरी गति आरोहण (Ascent) और अवरोहण (Descent) श्रीअरविन्द के पूर्णयोग की विशेषता है । और जिसे प्राप्त कर योग अपनी परिपूर्णता को प्राप्त हुआ है तथा इसी सर्वांग परिपूर्णता के कारण उसे पूर्णयोग के नाम से अभिहित किया जाता है । श्रीअरविन्द का पूर्णयोग वहां से प्रारम्भ होता है जहां अन्य समस्त परम्परागत योगों की परिसमाप्ति होती है ।

कुछ अन्य योग भी ऐसे हैं जिनमें सामान्य कोटि का अवतरण(Descent) आरोहण (Ascent) के साथ ही होता है परन्तु केवल उतना अवतरण श्रीअरविन्द के ‘पूर्णयोग’ में इसलिये पर्याप्त नहीं कि उसमें हमारी समूची सत्ता को रूपान्तरित कर देने की शक्ति नहीं, किन्तु इस पूर्णयोग में रूपान्तरकारिणी शक्ति पूर्ण रूप से विद्यमान है । पातंजलि योग आदि में जो शांति, प्रेम, आनंद आदि का अवतरण होता है, वह मुक्ति के लिये होता है, परन्तु श्रीअरविन्द के पूर्णयोग में जो अवतरण होता है, वह पूर्ण रूपान्तरकारी होता है तथा मन, प्राण और स्थूल शरीर तक का रूपान्तरण साधित करता है । साधक अपनी साधना द्वारा ऊर्ध्वारोहण करता है, वह अपनी वर्तमान चेतना से उठकर भागवत चेतना की ओर बढ़ता है। प्रत्युत्तर में भागवत-चेतना अवतरित होकर साधक की सामान्य चेतना का समूचा रूपान्तरण साधित करती है । यही एक विशेष विचार है जो श्रीअरविन्द के योग में विशेष महत्व रखता है ।

 समस्त परम्परागत योगों की तुलना में यह एक सर्वांग परिपूर्णतायुक्त एक अभिनव योग है  श्रीअरविन्द के स्वयं के शब्दों मेंपुराने योगों की तुलना में यह नया है, क्योंकि इसका लक्ष्य संसार से विदा हो जाना और स्वर्ग में जीवन बिताना या ‘निर्वाण’ प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन और सत्ता का परिवर्तन करना है – किसी गौण या प्रासंगिक कार्य के तौर पर नहीं, वरन् विशेष और मुख्य उद्देश्य के तौर पर प्राचीन योग में उस आत्मा की अनुभूति पाने की चेष्टा की जाती थी जो सदा मुक्त और भगवान के साथ एक है । प्रकृति का बस, इतना ही परिवर्तन पर्याप्त होता था जो उसे उस ज्ञान और अनुभव में बाधक होने से रोक सके । प्रकृति को नीचे भौतिक स्तर तक पूर्ण रूप से परिवर्तित करने की चेष्टा बहुत कम योगों ने की और सो भी एक सिद्धि के रूप में की, अन्य किसी रूप में नहीं, पार्थिव चेतना में किसी नवीन दिव्य प्रकृति की अभिव्यक्ति की दृष्टि से नहीं की l”

इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीअरविन्द के पूर्णयोग का लक्ष्य केवल सामान्य अज्ञ-जग-चेतना से ऊपर उठकर परमात्म भाव को प्राप्त करना ही नहीं है, प्रत्युत उस परमात्म भाव की विज्ञान-शक्ति को इस मन, बुद्धि, प्राण और शरीर के जड़त्व में ले आना, इनको दिव्य बना देना, इनमें भगवान को प्रकट करना और जड़ पार्थिव प्रकृति में दिव्य जीवन का निर्माण करना इसका लक्ष्य है ।

पूर्णयोग की साधन शैली -

इतना सब कुछ समझ लेने के बाद अब यह प्रश्न होता है कि श्रीअरविन्द के सर्वांग परिपूर्णतायुक्त तथा समस्त परम्परागत योगों का अतिक्रमण कर जाने वाले पूर्णयोग की साधन-शैली क्या है, उसकी विशेष प्रक्रिया क्या है ? जिस प्रकार पातंजलि का योग – मंदिर ‘यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा- ध्यान-समाधि’ के अष्ट दृढ़ स्तम्भों पर खड़ा है,  इस प्रकार श्रीअरविन्द की साधना के मौलिक अभ्यास क्या है ? यहां श्रीअरविन्द के पूर्णयोग की साधन शैली तथा अभ्यास पद्धति का अत्यन्त संक्षेप में विवरण दे देना समीचीन होगा । श्रीअरविन्द ने पूर्णयोग की साधना के लिये, अन्य योग साधनाओं की भांति बहुत सारे नियमों एवं उपनियमों का विधान नहीं दिया है । उसके अनुसारइससाधना का कोई बंधा हुआ मानसिक अभ्यास क्रम या ध्यान का कोई निश्चित प्रकार अथवा कोई मंत्र या तंत्र नहीं है । यह साधना साधक के हृदय की अभीप्सा (Aspiration) से प्रारम्भ होती है । साधक आरम्भ में अपने उर्ध्व-स्थित या अन्तःस्थित आत्मा का ध्यान करता है, अपने-आपको भागवत्-भाव के अधीन कर देता है, उर्ध्व-स्थित भागवत – शक्ति और उसके कार्य की ओर अपने आप को खोल देता है और इन बातों के विरुद्ध जो कुछ है उसका परित्याग करता है । श्रद्धा, अभीप्सा तथा शरणागति से ही यह आत्मोद्घाटन बनता है l”

इस प्रकार यह केवल श्रद्धा, अभीप्सा, परित्याग, आत्मोद्घाटन और समर्पण द्वारा अग्रसर होने वाला पथ है । जितनी अचल, अटल, अटूट और बलवती श्रद्धा होगी, उतनी ही गहरी, उत्कट एवं व्याकुल अभीप्सा अर्थात् गंभीर आत्म- जिज्ञासा की अन्तश्चेष्टा होगी , दिव्य जीवन जीने के लिये व्याकुल बना देने वाली ऐसी चाह होगी कि जिसको प्राप्त किये बिना रहा न जा सके । और फिर श्रद्धा और अभीप्सा हमारी सत्ता के प्रत्येक स्तर – ह्रदय, बुद्धि, मन, प्राण और शरीर पर बनी रहे, वृद्धिगत होती रहे । इस प्रकार की श्रद्धा (Faith) तथा अभीप्सा(Aspiration) के अभाव में श्रीअरविन्द के पूर्णयोग में प्रवेश होना अत्यन्त कठिन है । इन्हीं से सम्बन्धित है ‘परित्याग’(Rejection) अर्थात् हमारी अपरा-प्रकृति की अशुद्ध, पवित्र एवं त्रुटिपूर्ण गतियों एवं भावों का ‘परित्याग’(Rejection) यह परित्याग की प्रक्रिया भी साधक की सत्ता के प्रत्येक स्तर पर सतत चलती रहनी चाहिये । इस प्रक्रिया की परिपूर्णता की स्थिति तब आती है जब साधक अपने-आपको अपनी सत्ता के प्रत्येक स्तर पर खोलता चला जाता है । यह ‘आत्मोद्घाटन’ (opening of one’s own self towards Divine Influence) साधक को ‘समर्पण’ की ओर ले जाता है । ‘समर्पण’ (Surrender to the will of God) भी साधक की सत्ता के प्रत्येक स्तर पर और उसके प्रत्येक खण्ड का होना चाहिये । साधक के इन सब अभ्यासों की परिपूर्णता की स्थिति में उसका ‘हृतपुरुष’ अथवा ‘चैत्यपुरुष’ (Psychic Being) जागृत हो जाता है । ‘चैत्यपुरुष’ से आशय है हमारे अन्दर स्थित भगवान् की नन्हीं-सी चिंगारी उनकी ज्योति जो सभी में है । यह हमारी अन्तरतम केन्द्रीय सत्ता है जिसका निवास हृदय के ठीक पीछे है, हृदय के अन्दर नहीं, और जो सदैव ही भगवान् की ओर उन्मुख रहता है । जब तक इस चैत्यपुरुष की जागृति नहीं हो जाती, तब तक इस योग की वास्तविक प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होती । श्रीअरविन्द कहते हैं किजीवन और प्रकृति के रूपान्तरण के लिये चैत्यपुरुष का जागरण और प्रकृति पर उसका नियंत्रण एवं शासन अनिवार्य है l” अर्थात् चैत्य-पुरुष का जागृत होकर आगे आ जाना और हमारी समूची सत्ता-स्थूल शरीर, प्राण, मन, बुद्धि आदि को अधिकृत कर लेना, उसका स्वामी बन जाना, उसका सूत्रधार बन जाना अत्यावश्यक है । यह चैत्यपुरुष ही होता है जो साधक को भगवान से जोड़ देने का कार्य सम्पन्न करता है ।

 श्रीअरविन्द के पूर्णयोग की साधना में इसचैत्योन्मीलन” का अपना एक विशेष, प्रमुख एवं महत्वपूर्ण स्थान होता है । श्रद्धा, अभीप्सा, परित्याग, आत्मोद्घाटन और समर्पण के जो मौलिक अभ्यास है, वे केवल चैत्य-पुरुष को ही आगे लाने के लिये होते हैं । चैत्य जागरण के पश्चात् साधक की साधना उसी के निर्देशन में चलती है, वहीं साधक का सम्बन्ध  उस वैश्विक महाशक्ति या ‘मातृशक्ति’ (Cosmic Force या Mother’s Force) से जोड़ देता है जिससे महाशक्ति के प्रवाह का स्रोत साधक की ओर प्रवाहित हो उठता है और फिर वह ‘मातृशक्ति’ साधक को नाना प्रकार की अनुभूतियां देती हुई, उसकी चेतना में स्थित शक्तियों के विभिन्न केन्द्रों को खोलती हुई क्रम-क्रम से उसकी समूची सत्ता के अंग-प्रत्यंग का परिष्कार कर उनका रूपान्तरण साधित करती है । स्वयं मां भगवती ही साधक के अन्दर साधना कर रही होती है । साधक अपनी साधना का सारा भार संसार का सृजन करने वाली विश्व-जननी भगवान् की चित् शक्ति श्रीमाँ भगवती के पाद-पद्मों में समर्पित कर पूर्णतया निश्चिंत हो जाता है ।

"सारा जीवन ही योग है।"

“सारा जीवन ही योग है।” यह सन्देश अपने लक्ष्य और साधना दोनों में पूर्ण है। जीवन और योग सम्बन्धी इस संपूर्ण संदेश मंत्र के दाता है – युग द्रष्टा, नवचेतना के पुरोधा श्रीअर‌विन्द । इस मंत्र संदेश के गूढ़ अर्थ को समझने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम श्रीअरविन्द की दृष्टि में जीवन और योग क्या है ? इसे जाने ।

जीवन एक विकास यात्रा है। एक आरोहण है, दिव्य यज्ञ है इस सत्य को हम वैदिक काल से आज तक सुनते चले आ रहें है। यह जीवन यात्रा आज तक अनवरत चली आ रही है, किन्तु इसका अंत कहीं दिखाई नहीं देता । इसका एक ही कारण है- सृष्टि सृजन और विकास के पीछे मानव जीवन में एक प्यास है, गहन अभीप्सा है, जो शांत होना नहीं जानती। उसे शांति चाहिए, प्रकाश चाहिए, ज्ञान चाहिए, पूर्णता चाहिए, आनंद और अमरता चाहिए। सत्य रूप में मानव को भगवान् ही चाहिए।

किंतु हम जीवन यात्रा के मध्यकाल से गुजर रहे हैं जहाँ हम देव और असुर शक्तियों से घिरे हुए हैं । असुर असत्य शक्ति है । भगवद्वेषी है। भौतिक जगत् पर राज कर हमें भय, निराशा, तनाव, अवसाद, रोगों-भोगों, इच्छाओं, कामनाओं, वासनाओं, कुल मिलाकर अवचेतना के जाल में जकड़े रखती है l प्रकाश, सत्य ज्ञान और सद्‌‌भाव की पूर्ण विरोधी. है।

वहीं दूसरी ओर देव शक्तियाँ जो सत्य की मूल शक्ति है । जीवन में शांति, विश्वास, धैर्य, समता, ज्ञान, भक्ति और कर्म की शक्ति द्वारा भगवान् की उपस्थिति, कृपा-आशीर्वाद और मानव आत्मा पर प्रभु के अनन्य प्रेम की अनुभूति प्रदान कर रही है। ताकि मानव के अंदर सत्य, सद्भाव तथा दिव्य सौन्दर्यात्मक गुणों की वृद्धि हो। जीवन पवित्रता और पूर्णता को प्राप्त हो l

श्रीमां के अनुसार जीवन सत्य और मिथ्यात्व के बीच, प्रकाश और अन्धकार के बीच, प्रगति और अवनति के बीच, शिखरों पर उत्थान या खाई में पतन के बीच एक चुनाव है l हर एक को खुलकर चुनाव करने का अधिकार है । हमें परमात्मा से योग करके इसी जीवन में इसी शरीर में नव जन्म लेकर अध्यात्म के शिखर पर चढ़‌ना है या आसुरी शक्तियों की पकड़ में आकर जीवन को अवचेतना की खाई में धकेल देना है ? नहीं, कदापि नहीं।

भगवान् ने सृष्टि पर जीवन सुन्दर और दिव्य बनाने के लिए दिया है। हम मानव भगवान् की सबसे सुन्दर और विकसित कृति है। वह मानव के अंदर जीवंत सत्ता है। उसने मानव के अंदर असीम क्षमताएँ और संभावनाएं देकर उसे धरती पर उतारा है। अतः उसे हमसे कई अपेक्षाएं है l प्रथम तो हम ज्ञान, भक्ति और कर्म की साधना करें। जीवन में उतारें और उस जैसे  बन जायें।

इसके लिये आवश्यक है – प्रयास, सतत साहसिक प्रयास और आन्तरिक प्रगति की। साहसिक प्रयास और आन्तरिक प्रगति ही हमें उस जैसा बना सकती है। व्यक्ति स्वयं अपनी सत्ता के करणों – शरीर, प्राण, मन और हृदय के आंतरिक रुपान्तरण और फिर दिव्यीकरण के लिये साधना द्वारा प्रयास करता रहे।

उपनिषद कहता है – चरैवेति ——– चरैवेति——— अर्थात् चलते रहो – चलते रहो। चलते रहना ही जीवन है हर परिस्थिति में आगे बढ़ते जाना जीवन है।

श्रीमां के अनुसार जीवन गति है, प्रयास है, आगे की ओर बढ़ना है, पर्वत की चढ़ाई है, नवीन द्युतियों की ओर, भावी सिद्धि की ओर आरोहण है। धरती पर जीवन तत्वतः प्रगति का क्षेत्र है। लेकिन जो प्रगति की जानी है उस समस्त प्रगति के लिये जीवन कितना अल्पकालिक है। इस अल्पकाल के जीवन में मानव ऐसा क्या करे कि उसका एक ही जीवन समग्र जीवन बन जाये।

जीवन को योगमय बनाने के लिये हमें साधारण और आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य-अंतर को जानना आवश्यक है l साधारण जीवन का लक्ष्य है – अपने कर्तव्यों को पूरा करना l आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य है – अपने अंदर की गहराईयों में भगवान् और उनकी उपस्थिति के प्रति सचेतन होना l उन्हें अपने अंदर खोजना, पाना और उनके प्रति पूर्ण समर्पित होकर ‘वही’ बन जाने की साधना में रत हो जाना l ताकि हमारे शरीर से होने वाले सभी कर्म,  मन के विचारों, भावनाओं,  के पीछे उनकी शक्ति के संचालन को स्पष्ट अनुभव कर सकें कि हम मानव एक ‘यंत्र’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हमारे जीवन के संचालनकर्ता केवल भगवान् और उनकी दिव्य शक्ति है। यही योग साधना हमारे आध्यात्मिक रुपान्तरण का मुख्य आधार होगी। और दिव्य जीवन की कसौटी भी l

आध्यात्मिक आधार होने पर ही मानव जीवन में भगवान् का योग लीला के अधीश्वर के रूप में दर्शन करता है और हृदय में अनुभव करता है कि उनकी कृपा, करुणा, आज्ञा और आशीर्वाद के बिना न तो उसका कोई अस्तित्व है। न ही वह जीवन में कुछ कर सकता है। जो भगवान् की इस लीला पद्धति में भाग लेता है वही योग पथ का पथिक बन सकता है। यही योग उसे सारा जीवन करना है।

महर्षि श्रीअरविन्द के अनुसार “भारतीय योग अपने सार-तत्व में प्रकृति’ की कुछ महान् शक्तियों की एक विशेष क्रिया या रचना है, यह स्वयं विशिष्ट एवं विभाजित है और विविध प्रकार से निर्मित है। अतएव, यह अपने बीज रूप में मनुष्य जाति के भावी जीवन के इन सक्रिय तत्वों में से एक है। यह अनादि युगों का शिशु है तथा हमारे इस आधुनिक समय में अपनी जीवन-शक्ति और सत्य के बल पर जीवित है। अब यह उन गुप्त संस्थाओं और सन्यासियों की गुफाओं में से बाहर निकल रहा है जिनमें इसने आश्रय लियाथा । यह आजकल की जीवित मानवीय शक्तियों और उपयोगिताओं के भावी संघात में अपना स्थान खोज रहा है।” इसकी क्रियाएँ दावा करती है कि वे मानव जाति के इस जीवन को उसके अन्तरतम गुप्त कक्ष तक अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व की उच्चतम चोटी तक ले जायेगी।

श्रीअरविन्द के अनुसार अगर जीवन और योग दोनों का सूक्ष्म चिंतन करें तो संपूर्ण जीवन ही सचेतन या अवचेतन रूप से योग है । क्योंकि अपनी सत्ता में प्रसुप्त क्षमताओं के आविर्भाव द्वारा आत्म परिपूर्णता की दिशा में व्यक्ति का विधिबद्ध प्रयत्न और मानव-व्यष्टि का उस विश्व व्यापी तथा परात्पर सत्ता के साथ मिलन जिसे कि हम मनुष्य में और विश्व में अंशतः अभिव्यक्त देखते हैं । परंतु जीवन को उसकी प्रतीतियों के पीछे जाकर देखने पर सारा जीवन ही प्रकृति का विशाल योग दिखाई देता है  – उस प्रकृति का जो अपनी संभाव्यशक्तियों के सदा – वृद्धिशाली आविर्भाव में अपनी पूर्णता साधित करने और अपनी ही दिव्य वास्तविक सत्ता के साथ अपने आपको एक करने का प्रयास कर रही है  । मनुष्य में, अपने विचारशील प्राणी में, वह इस पृथ्वी पर पहली बार क्रिया के उन आत्मसचेतन साधनों और इच्छाशक्तियुक्त प्रणालियों को आयोजित करती है जिनके द्वारा यह महान् प्रयोजन अधिक द्रुत और प्रबल गति से पूरा हो सके ।  मनुष्य में होने वाला सचेतन योग प्रकृति में हो रहे अवचेतन योग की भांति स्वयं जीवन के साथ बाहरी तौर पर सर्वथा सहवर्ती हो जाए । जीवन में योग की पूर्णता को प्राप्त करके ही संपूर्ण जीवन में  योग हो सकता है।

“सारा जीवन ही योग है” के मंत्र दृष्ट्रा महर्षि श्रीअरविन्द के अनुसार योग क्या है? हर एक योग मनुष्य के लिये एक नया जन्म है। समान्य जीवन से ऊपर उठकर किसी अधिक उच्च जीवन में जन्म लेना है, मनुष्य के इस मानसिक जड़-भौतिक जीवन को अधिक ऊँची आध्यात्मिक चेतना में और अत्यन्त महान् और उच्चतम दिव्य सत्ता में ऊपर उठाना है। इस दिव्य अवस्था को प्राप्त करने के लिए स्वयं मनुष्य के अंदर सत्य को पाने के लिए आध्यात्मिक जीवन जीने की तीव्र इच्छा (अभीप्सा) होनी चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को अनुभव करना चाहिए कि आध्यात्मिक जीवन जीना उसकी सच्ची मांग है। उसकी आवश्यकता भी है। तभी वह सफलता पूर्वक योग के पथ पर चल पायेगा।

यदि मानव के अंदर योग करने की सच्ची अभीप्सा और पुकार है तो उसके हृदय के पीछे बैठी उसकी अंतरात्मा अंदर से स्पष्ट अनुभव करेगी कि उसके अंदर एक गंभीर और विशाल आव्हान उठकर कह रहा है उसे सचमुच में कुछ नया चाहिए। जो बहुत शुध्द, पवित्र, शांत और आनंदमय हो। वास्तव में विचारशील मनुष्य के हृदय में योग का बीज गुप्त रूप से निहित है अतः उसकी अंतरात्मा अपनी योग-यात्रा के आरंभ के लिए किसी भी पथ का चुनाव कर सकती है क्योंकि परम प्रभु के विशाल द्वार तक पहुँचने के अनेक रास्ते हैं।

मानव की अंतरात्मा का खिंचाव, उसका सहज स्वाभाविक विकास उसे अचेतन रूप से इस पुकार की ओर खींच सकता हैं या फिर किसी धर्म या किसी दर्शन से आकर्षित होकर मनुष्य अपनी ‘योग-यात्रा शुरू कर सकता है वह धीरे-धीरे भी चल सकता है या अचानक कोई स्पर्श या धक्का पाकर जल्दी-जल्दी भी बढ़ सकता है अथवा किसी आंतरिक आवश्यकता या किन्हीं बाहरी परिस्थितियों के दबाव में आकर तीव्र गति से आगे बढ़ सकता है मात्र एक ‘शब्द’ के श्रवण मात्र से उसके मस्तिष्क की सभी उलझी हुई गांठे सुलझ सकती है या फिर किसी दिव्य आत्मा जिसने योग पथ को जान और जी लिया है के प्रभाव में निरंतर रहकर, उसका संस्पर्श प्राप्त कर वह आगे बढ़ सकता है।

एक बार मानव सत्ता में किसी आंतरिक दिव्य परिवर्तन की चाह जाग्रत हो जाए और उस चाह का शक्तिशाली प्रभाव उसे अंदर से घेर ले तो निश्चित मानव मन सनातन की ओर मुड़ने लगता है और उसका हृदय भी सांत रूपों की संकीर्णता से ऊपर उठकर चाहे किसी भी मात्रा में हो, अनंत में अनुरक्त हो जाता है। तब उसके अंदर की वह कली शीघ्र या शनैः शनैः, एक एक पंखुड़ी करके, एक एक उपलब्धि के द्वारा खुलने लगती है उस समय से उसका सारा जीवन, सारे विचार, उसके शक्ति सामर्थ्य के सभी व्यापार और समस्त निष्क्रिय या सक्रिय अनुभव ऐसे बहुविध आघात बन जाते हैं जो आत्मा के आवरणों को छिन्न-भिन्न कर डालते हैं और उसके अनिवार्य विकास के मार्ग में आनें वाली बाधाओं को दूर कर देते है। परिणाम स्वरूप योग-पथ का यात्री अपने अंदर जागृत नयी आध्यात्मिक विचार शक्ति के प्रति स्वीकृति तथा हृदय की अभीप्सा और संकल्प शक्ति द्वारा ऊपर की ओर मुड़ता चला जाता है। किंतु इस महान् आतंरिक उपलब्धि को केवल ‘मन’ से सोचकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसे जीवन में जीना होगा और उसे जीने के लिए मानव सत्ता के अंदर एकीभूत एकचित्तता की आवश्यकता होती है। मानव मन में कोई भ्रम, संशय या दुविधा नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो भगवान की खोज करता है उसे अपने आपको पूरी तरह भगवान को, केवल भगवान को देना होगा ।

श्रीअरविन्द कहते हैं जो भगवान को चुनता है वह भगवान के द्वारा चुना जा चुका हैं। उसने वह दिव्य संस्पर्श प्राप्त कर लिया है जिसके बिना आत्मा का जागरण और उन्मीलन हो ही नहीं सकता ।

साधक के लिए आवश्यक है कि वह अपने अंदर की समस्त न्यूनताओं का त्याग कर दे। अपने अंदर से अहंभाव पूर्ण मन की उस एकांकी प्रवृत्ति को निकाल फेंके जो बार-बार आग्रह पूर्वक कहती है, मेरा ईश्वर, मेरा अवतार, मेरा पैगम्बर, मेरा गुरू, और इसके बल पर साम्प्रदायिक या धर्मान्ध भाव से अन्य सब अनुभवों तथा उपलब्धियों का विरोध करती है। योग-पथ के सच्चे पथिक को दिव्य उपलब्धियों को प्राप्त करना है तो समस्त साम्प्रदायिकता एवं समस्त धर्मान्धता से अलग रहना होगा। यदि बुध्द, ईसा या कृष्ण हमारे अंदर व्यक्त या मूर्तिमन्त नहीं हुए हैं तो केवल बाहर से ही कृष्ण, ईसा या बुध्द कि पूजा करना पर्याप्त नहीं होगा। परम प्रभु का प्रत्येक साधन मनुष्य की अपरिवर्तित अवस्था तथा उसके अंदर होने वाली भगवान की अभिव्यक्ति का सेतु भर होता है।

श्रीअरविन्द ने एक नवीन योग का प्रादुर्भाव किया। इसे पूर्ण योग कहते है इस पूर्ण योग का एक महान् लक्ष्य और उद्देश्य है- इस जगत् में भगवान की इच्छा को कार्यान्वित करना। प्रत्येक मानव को अपने अंदर एक आध्यात्मिक रूपान्तर साधित करना और प्रकृति में दिव्य परिवर्तन लाना। मनुष्य जाति की मनोमय, प्राणमय, अन्नमय प्रकृति और जीवन के अंदर दिव्य प्रकृति और दिव्य जीवन को उतार लाना।”

वास्तव में जिस उद्देश्य से अवतार पृथ्वी पर आते है वह हैं – बार-बार मनुष्य को ऊपर उठाना। उसमें उत्तरोत्तर उच्च से उच्चत्तर मानवता का विकास करना, एक महत्तर, फिर उससे भी महत्तम भागवत सत्य का विकास करना। बार-बार पृथ्वी पर अधिकाधिक मात्रा में स्वर्ग को तब तक उतारते रहना जब तक हमारा परिश्रम सफल न हो जाए आत्मा का कार्य सिध्द न हो जाए अर्थात् इस स्थूल भौतिक जगत् में सबके अंदर सच्चिदानंद की पूर्ण अभिव्यक्ति न हो जाये ।

योग की सफलता का रहस्य उसे अपने जीवन के लक्ष्यों में से एक लक्ष्य मानकर उसपर चलना नहीं है वरन् उसकी पूर्ण सफलता का रहस्य है, उसे ही संपूर्ण जीवन मान लेना। जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाई क्यों न आ जाये जब हमने योग-पथ चुन ही लिया है तो हमें विश्वास रखना होगा कि उस कठिनाई से पार करने वाली शक्ति भी योग द्वारा हमें उस कठिनाई पर विजय अवश्य दिलायेगी।

योग-पथ के पथिक को अपने आपसे सचेतन होना होगा, क्योंकि अपनी सत्ता के अतितुच्छ भाग से ही अभी हम अचेतन हैं, इसके उच्चत्तर अंगों से ही जिनमें हमारी महती संभावनायें भरी पड़ी है हम अचेतन हैं। यह अचेतना ही हमको अपनी प्रकृति के अपरिमार्जित भाग के साथ नीचे बांधे रखती है और उसके परिवर्तन या रूपान्तर को अटकाती है इस अचेतना द्वारा ही अदिव्य शक्तियाँ हमारे अंदर घुस आती है और हमको अपना गुलाम बना लेती है। इसलिए हमें अपनी सत्ता रूपी यंत्र के पुरजे-पुरजे को अलग-अलग देख लेना होगा, विवेक करना होगा। खरे-खोटे की परख करनी होगी। यह देखना होगा कौन-सी शक्तियाँ हमें ऊपर उठाने में मदद करती है और कौन-सी शक्तियाँ हमें नीचे की ओर खींचती है, हमें सतत् सजग रहकर यह देखते रहना होगा कि क्या सत्य है और क्या असत्य । क्या दिव्य है और क्या अदिव्य । फिर एक को सदा स्वीकार करना तथा दूसरे का अनवरत त्याग । क्योंकि जो घर भगवान को निवेदित कर दिया गया है, उसमें सत्य और मिथ्या, प्रकाश और अंधकार, समर्पण और स्वार्थ साधन साथ-साथ नहीं रहने दिये जायेंगे। अतः हमारी योग-यात्रा में जो बाधक है, हमें भगवान के निकट आने में भरमाता है, बाधा पहुँचाता है उस सबका त्याग करें।

शरीर द्वारा किये जाने वाले आसन-प्राणायाम की कियाएँ योग के अंग मात्र है, पूर्णयोग नहीं। इनका लाभ केवल शरीर और प्राण के विकास और शुद्धिकरण के लिये है। योग के अनेक चरण है इन सबको पार कर मानव ‘पूर्णयोग’ की उपलब्धि की ओर बढ़ता है।

श्रीअरविन्द का ‘पूर्णयोग’ सर्वांगपूर्ण योग है। जिसका आदर्श है- “सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक पूर्णता के बीच सर्वविजयी सामंजस्य स्थापित करना। जीवन को बिना खोये भगवान को प्राप्त करना। मानव जीवन के अंदर भगवान और प्रकृति का पुर्नमिलन साधित करना। प्रत्येक मानव मन, बुध्दि तथा शरीर रूपांतरित होकर आत्मा के प्रकाश को प्रकट करे। संपूर्ण जीवन और संसार को आध्यात्मिक बनाये न कि व्यक्ति अकेला संसार छोड़कर कहीं एकान्त में रहते हुए आत्मानंद का उपभोग करें।”

योग में वह शक्ति है- असंगति को सुसंगति में तथा विरोध को समन्वय में बदल देती है। श्रीअरविन्द की इस अमृतवाणी को प्रत्येक योग पथ के अभीप्सु को आत्मसात् कर लेना चाहिये- “योग के द्वारा हम असत्य से सत्य में, निर्बलता से शक्ति में, दुःख और क्लेश से परम आनन्द में, बन्धन से मुक्ति में, मृत्यु से अमरत्व में, सम्मिश्रण से शुध्दता में, अपूर्णता से पूर्णता में, आत्म-विभाजन से एकत्व में, माया से ईश्वर में आरोहण कर सकते हैं। योग के अन्य सभी उपयोग विशिष्ट और आंशिक लाभों के लिये होते हैं, जिन्हें सदा पाने की चेष्टा करना उचित नहीं होता। केवल वही योग पूर्ण है जिसका लक्ष्य भगवान की पूर्णता को प्राप्त करना हो। भागवत परिपूर्णता का साधक ही पूर्ण योगी हैं।”

श्रीअरविन्द का योग है अपने आपको भगवान को सौंप दो अन्य किसी को भी नहीं और भगवती माता के साथ संयुक्त होकर विज्ञानमय भगवान की पराज्योति, शक्ति, विशालता, शांति, पवित्रता, सत्य, चेतना, आनंद को अपने अंदर ले आओ। मानव के अंदर सब कुछ भगवान के द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है आंतरिक चेतना जागृत की जा सकती है। परदे हटाए जा सकते हैं यदि कोई भगवान को चाहे तो भगवान स्वयं उसके हृदय को शुध्द करने का कार्य अपने हाथ में ले लेंगे, उसकी साधना को विकसित करेंगे यदि साधक पूर्ण विश्वास के साथ अपने आपको भगवान के हाथों में सौंप दे तो उसे भगवान की आंतरिक सहायता और पथ प्रर्दशन प्राप्त होंगे और अंतर में भगवान की अनुभूति बढ़ती रहेगी यदि मानव का संदेहकारी मन कम सक्रिय हो और विनम्र समर्पण का संकल्प बढ़ता रहे तो ऐसा करना पूर्णतः संभव हो सकता है फिर और किसी शक्ति, सामर्थ्य और तपस्या की आवश्यकता नहीं होती बल्कि एकमात्र यही पर्याप्त है।

वास्तव में मनुष्य की अन्तरात्मा-आत्मा जब भगवान की चेतना से संयुक्त हो जाती है यही योग की उच्चतम स्थिति है। इस उच्चतम स्थिति में किया गया प्रत्येक कर्म ‘योगस्थ करू कर्माणि’ अर्थात् हे मानव, तू योग में स्थित होकर कर्म कर । यह भी योग है । इस स्थिति में स्थित होकर किये गये आसन, प्राणायाम, एकाग्रता, ध्यान, मुद्रा आदि विशेष प्रभावकारी होते हैं। बिना भागवत चेतना से संयुक्त होकर किया गया ‘योग’ अयोग है एवं पूर्णतः अप्रभावकारी है।

यह योग-शरीर को भागवत सौंदर्य, प्राण को भागवत शक्ति, मन को भागवत ज्ञान तथा हृदय को भागवत प्रेम और आंनद को अभिव्यक्त करने का दिव्य साधन है। इसे सारा जीवन, हर जीवन में करके ही हम भगवान से “योग” कर सकते हैं भगवान को अपने अंदर खोज सकते हैं। भगवान के ‘योगमय बालक’ बन सकते हैं।

सारा जीवन ही योग का स्पष्ट अर्थ केवल ईश्वर प्राप्ति नहीं बल्कि आन्तरिक और बाह्य जीवन में मानव सत्ता के एक-एक अंग का आमूल चूल दिव्य परिवर्तन तथा परिपूर्ण उत्सर्ग है ताकि उसमें भागवत चैतन्य व्यक्त हो l मानव भगवान् के कार्य का सच्चा यंत्र बनें । इसके लिये मानव मात्र को सचेतन होकर आन्तरिक अभ्यास, अपनी अन्तरात्मा की पुकार के द्वारा सम्पूर्ण जीवन का उत्सर्ग-करते हुए जीवन जीने की दिव्य कला शिक्षा को तब तक प्राप्त करना होगा जब तक कि भगवान् स्वयं उसे गन्तव्य तक न पहुंचा दे l

इस योग की साधना का जो मूलभाव पक्ष है – मानव को अपनी प्रकृति को शुद्ध करना ताकि उसके अंदर सत्ता के अंगों में परात्पर शक्ति का सहज अवतरण होकर एक सुदृढ़ आधार तैयार हो । मानव के अन्दर परात्पर शक्ति का जितना – जितना अवतरण होगा, वह निम्न प्रकृति की जटिलताओं से मुक्त होता जायेगा l

योग का मार्ग धैर्य का मार्ग है l  जरा सी जल्दबाजी से फिसलन का अंदेशा बना रहता है l इसीलिए इस सन्देश के मन्त्र दाता श्रीअरविन्द ने योग के मुख्य आधार अंगों – स्थिरता, शान्ति और समता द्वारा नीरव होकर अपने अन्दर साधना द्वारा योग की नींव डालने की बात कही है ताकि हमारी सता विशेषकर मन अचंचल होकर श्रद्धा, अभीप्सा, आत्मदान या आत्मसमर्पण द्वारा भगवान् की ओर खुल सके। जीवन के प्रत्येक पग पर भगवान् की असीम अनुकम्पा पर विश्वास रखते हुए अपने विचारों, भावों हमारे जीवन में जो कुछ भगवान की इच्छा के विरुद्ध हो उसका त्याग करते रहें।  हमारे अंदर भागवत् ज्ञान, शक्ति, प्रेम और सौन्दर्य की अभीप्सा जागृत होकर और हम पूर्ण योग की तपस्या के योग्य पात्र बन सकें l

जब हम जीवन में योग साधना आरंभ करते है तब निश्चित रूप से कई प्रकार की आन्तरिक कठिनाईयाँ आती है। प्रगति में बाधाएँ भी आती है। लेकिन प्रत्येक को अपनी कठिनाईयों में से अपना रास्ता आप निकालना होता है। योग का मार्ग लंबा और कठिन है, इनका सामना करने के लिये एक दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है जो सब प्रकार की परिक्षाओं को देने के लिये तैयार हो। यह एक अनजाने प्रदेश की यात्रा पर किसी महान् और दिव्य लक्ष्य की खोज के लिये अज्ञात क्षेत्रों की यात्रा पर निकलने का साहस करते हैं। वे ही सच्चे योग जीवन के पथिक हैं ।

योग साधना करते हुए जैसे ही हमारी आंतरिक चेतना भगवान् की ओर खुलने लगती  है, हमें अपने अंदर एक द्वार खुलता हुआ अनुभव होता है। धीरे धीरे जीवन निर्माण हेतु योग का एक मजबूत आधार अंदर आकार लेने लगता है। हमारी चेतना बहीर्मुखी जीवन से अंतर्मुखी जीवन और योग की ओर खुलती है परिणाम स्वरुप हम कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं का स्वयं त्याग करते जाते हैं l बाहरी संबंधों के बंधन से मुक्त होकर ईश्वर से मिलन की ओर प्रबलता के साथ उन्मुख होते हैं। अन्दर एक दिव्य प्यास जागृत होती है। यही प्यास हमारे अंदर चैत्य पुरुष को जागृत कर सामने लाती है। जब एक बार चैत्य पुरुष सामने आ जाता है तो वह हमारे अंदर की अवचेतना, निम्न और आंतरिक विकास के समस्त निम्न शत्रु शक्तियों को एक-एक करके खदेड़कर बाहर निकालना शुरू कर देता है। हमारे अंदर भागवत् प्रेम, भक्ति और सत्य चेत‌ना की प्राप्ति का योग आरंभ कर देता है। अंदर पूर्ण श्रद्धा, भक्ति, समर्पण, आत्मोद्घाटन और आत्मोत्सर्ग का भाव जागृत होकर शक्ति द्वारा हमारी सत्ता के अभिनव रुपान्तरण का कार्य अंदर होने लगता है जो पल-पल आनंद की अनुभूति कराते हुए हमारी अभीप्सा तीव्र कर हमें दिव्य पथ की ओर आरोहण करने में सहायक होता है। ध्यान साधना के द्वारा अपने अंदर सत्य चेतना में केंद्रीभूत होकर अंदर हृदय की गहराई में प्रवेश करके ही हम अपने सारे जीवन को योगमय अनुभूत कर सकते हैं। साधना का अर्थ है – नित्य निरंतर योग का अभ्यास करना। अभ्यास ही जीवन निर्माण और दिव्यीकरण का सच्चा आधार है। श्रीअरविन्द के पूर्णयोग का जीवन में व्यवहार से मानव का सारा जीवन ही योगमय हो सकता है।

सार रूप मेंー

संसार में रहते हुए बुरी प्रवृत्तियों का त्याग करते हुए सहज, सरल और दिव्य जीवन जीना महाविजय और सौभाग्य है। संसार में केवल सांसारिकता में जीना पराजय और दुर्भाग्य है। जीवन को महाविजयी बनाने के लिए जीवन में हर क्षण हर पल भागवत चेतना में रहकर सक्रिय – सचेतन रहना ही सारा जीवन ही योग है।

जीवन तभी पूर्णता को प्राप्त करता है जब हमारा लक्ष्य और उद्देश्य पूर्णता प्राप्त करना हो । हम ईश्वर प्रदत क्षमता को विकसित कर जीवन के सभी क्षेत्रों में उसका सही उपयोग करें यही पूर्ण योग का सहज अर्थ है l हमारे जीवन का प्रत्येक छोटा-बड़ा कर्म प्रभु के स्मरण और समर्पण के साथ करना ही जीवन का योग है। जिसे सम्पूर्ण जीवन करके मानव सम्पूर्ण बन सकता है l

श्रीअरविन्द के अनुसार –

आरोहण के तीन क्रम हैं, – सबसे नीचे शारीरिक जीवन है जो आवश्यकता तथा कामना के दबाव के वशीभूत है, बीच में मानसिक, उच्चतर भावनामय तथा आन्तरात्मिक नियम है जो महत्तर हितों, अभीप्साओं, अनुभवों एवं विचारों को टोहता है और शिखर पर पहले तो गभीरतर आन्तरात्मिक तथा आध्यात्मिक भूमिका है और फिर अतिमानसिक नित्य चेतना है जिसमें हमारी सब अभीप्साएँ एवं जिज्ञासाएँ अपना आन्तरिक अर्थ जान लेती हैं।

योग का पथ का अत्यन्त विशाल है। अतः हम नियमित योग करें। फिर भी, हम नियमित योग करें या न करें भगवान का योग हर आत्मा के साथ समान रूप से निरंतर चल रहा है किंतु यदि हम नियमित योग करेंगें तो हम सचेतन बनेंगें तथा हम जीवन में योग की शक्तियों को शीघ्र जाग्रत कर उनकी अभिव्यक्ति का आनंद ले सकेंगें।

योग ही प्रत्येक देश तथा जगत में वैश्विक सुख-शांति तथा एकता की प्रतिष्ठा कर सकता है। वास्तव में सबकुछ हमारे ‘अहंकार’ के गलने के ऊपर निर्भर है।

जीवन एक प्रार्थना के रूप में हो ‘सारा जीवन ही योग’ बन जायेगा।

आलेख - सुश्री सुमन कोचर
चेयरपर्सन - श्रीअरविन्द सोसायटी पुदुचेरी
शाखा इन्दौर 541, म.गां. मार्ग, इन्दौर
फोन 9826067685