दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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हस्तमुद्रा विज्ञान

योग साधना में मुद्रा अभ्यास अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यदि मुद्रा अभ्यास पूर्ण एकाग्रता द्वारा सचेतन होकर किया जाए तो हमारी आंतरिक शक्तियाँ जागृत हो सकती है। योगियों द्वारा खोजी गई हस्त-मुद्राओं में ईश्वर का दिव्य तत्व, ज्ञान, प्रकाश, दिव्य ऊर्जा और शक्ति है। मुद्राओं का गलत और अविवेक पूर्ण अभ्यास करने से व्यक्ति की शक्ति और गुणों का ह्रास भी हो सकता है। मुद्रा अभ्यास आसन और प्राणायाम के अभ्यास से भी अधिक शक्तिशाली होता है।

‘मुद्रा’ संस्कृत शब्द है। मुद्रा हाथों की एक विशेष स्थिति है। मुद्रा हाथों की अंगुलियों और अंगुष्ठ को मिलाकर बनाई जाती है। अंगुष्ठ और अंगुलियों का स्पर्श कोमल दबाव तथा सही रूप में हो, शेष अंगुलियाँ निर्देशानुसार हो, तभी हस्त मुद्रा का लाभ मिलता है ।

मुद्रा दो प्रकार की होती है – स्थूल तथा सूक्ष्म

( सूक्ष्म ) योग तत्व मुद्रा –  तत्वों का संतुलन, नियमन करने वाली हस्त मुद्राएँ।

( स्थूल ) हठ योग मुद्रा – प्राण शक्ति का उत्थान करने तथा कुंडलिनी शक्ति के जागरण में सहायक मुद्राएँ।

ह + ठ साधना का पारिभाषिक योग शब्द है । इड़ा – पिंगला में प्रवाहित ‘ह’ – ‘सूर्य’ और ‘ठ’ – ‘चन्द्र’ के नाम से जाना जाता है। सूर्य और चन्द्र जब एकाकार होते हैं तब सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है। तांत्रिक परम्परा में ‘ह’ और ‘ठ’ के एकत्व प्राप्त करने पर आज्ञा चक्र में ठहरी हुई कुण्डलिनी शक्ति का प्राणापान की एकता द्वारा नाद बिन्दु तक षट चक्रों का भेदन कर योगी स्वयं की शक्ति और ज्ञान का साक्षात्कार करता है ।

हठयोग प्रदीपिका, गोरख पद्दति तथा शिव संहिता में शरीर को बलिष्ठ बनाने और साधना के लिए तैयार करने की अनेक विधियाँ दी गई है । इनमें आत्मा के मंदिर अर्थात् इस शरीर की शुद्धि से लेकर जीवन के सर्वोच्च अभियान आत्मप्राप्ति तक की विधा का उल्लेख किया गया है ।

मनुष्य अपने मस्तिष्क को आध्यात्मिक विकास का लक्ष्य बनाकर अपनी सत्ता के स्तरों – शरीर, प्राण, मन और ह्रदय को अनावृत एवं रूपान्तर कर दिव्य लक्ष्य प्राप्त कर सकता है ।

आदिम युग में मानव

प्राचीन आदिम युग में मानव का सीधा संबंध प्रकृति से था । भाषा के अल्प विकास के कारण अदिमयुगीन प्रजातियाँ जीवन व्यवहार में सहज ही शारीरिक संकेतों, हाव-भावों, चित्रों और अनुकृतियों के विकास के माध्यम से एक-दूसरे तक संवाद पहुँचाता था । इसमें वह अंग और हस्त मुद्राओं का प्रयोग कर अपनी भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करता था । जैसे-जैसे उसके आंतरिक ज्ञान के विकास के साथ भाषा का विकास होता गया, उसके विचार और भावनाओं को अभिव्यक्त करने के तरीके समृद्ध होते गये । मानव  के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति में हस्त मुद्राओं ने विलक्षण क्रांति ला दी । नृत्य कला , जीवन , स्वास्थ्य, योग एवं ध्यान में हस्त मुद्राओं का विशिष्ट स्थान है ।