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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands. You just go to and do your best.
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मानव चेतना के जितने भी स्तर हैं उनमें भौतिक स्तर एक ऐसा स्तर है जो पूरी तरहसे पद्धति,व्यवस्था,अनुशासन और प्रणाली के द्वारा नियंत्रित होता है। जड़-तत्त्व में जो नमनीयता और ग्रहणशीलता का अभाव है उसके स्थान पर हमें पूरे ब्योरे के साथ एक ऐसा सुसंगठन ले आना होगा जो सच्चा भी हो और व्यापक भी। इस सुसंगठन को लाते हुए,अवश्य ही,हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि हमारी सत्ता के सभी लोक-लोकांतर परस्पर संबद्ध,एक-दूसरे पर आश्रित और एक-दूसरे में प्रवेश किये हुए हैं। फिर भी,यदि किसी मानसिक या प्राणिक आवेग को शरीर के अंदर व्यक्त होना हो तो उसे एक अनुचित और सुनिश्चित प्रणाली का अनुसरण करना होगा। यही कारण है कि शरीर की समस्त शिक्षा को,अगर उसे फलोत्पादक होना हो तो,कठोर और सविस्तार,पूर्वदर्शी और प्रणालीबद्ध होना होगा। उसे आदतों का रूप ग्रहण कर लेना होगा,क्योंकि शरीर सचमुच अभ्यासों से गठित एक सत्ता है। परंतु वे सब अभ्यास संयमित और नियमित होने चाहिये और साथ ही उनमें इतनी पर्याप्त मात्रा में लोच होनी चाहिये कि वे सभी परिस्थितियों और मानव आधार की वृद्धि और विकास की आवश्यकताओं के अनुकूल अपने को ढाल सकें।
शरीर की समस्त शिक्षा एकदम जन्म के साथ ही आरंभ हो जानी चाहिये और जीवन-भर चलती रहनी चाहिये। उसके विषय में ऐसा कभी नहीं कहा जा सकता कि उसका आरंभ बहुत जल्दी हो गया है अथवा वह बहुत देर तक चल रही है। शरीर की शिक्षा के तीन प्रधान रूप हैं: १. शारीरिक क्रियाओं को संयमित और नियमित करना,२. शरीर के सभी अंगों और क्रियाओं का सर्वांगपूर्ण,प्रणाली-बद्ध और सुसमंजस विकास करना और ३. अगर शरीर में कोई दोष या विकृति हो तो उसे सुधारना।
बिलकुल छोटी उम्र से ही बच्चों को शारीरिक स्वास्थ्य शक्ति-सामर्थ्य और संतुलन का आदर करना सिखाना चाहिये। सौंदर्य की महान् आवश्यकता के ऊपर भी खूब जोर देना चाहिये। छोटे-छोटे बच्चों में सौंदर्य की अभीप्सा होनी चाहिये,इसलिये नहीं कि दूसरे उससे प्रसन्न होंगे या उससे उनका नाम होगा,बल्कि स्वयं सौंदर्य के प्रेम के लिये सौंदर्य की चाह होनी चाहिये। क्योंकि,सौंदर्य वह आदर्श है जिसे भौतिक जीवन में सिद्ध करना है। प्रत्येक मनुष्य के अंदर यह संभावना निहित है कि वह अपने शरीर की विभिन्न गतियों में सामंजस्य स्थापित करे। मनुष्य का शरीर,यदि वह अपने जीवन के आरंभ से ही शरीर-चर्या की किसी युक्तिपूर्ण पद्धति का अनुसरण करे तो वह अपना सामंजस्य स्थापित कर सकता है ।
