दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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कथक नृत्य का परिचय

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भारत के प्राचीन परम्परागत शास्त्रीय नृत्यों में कथक नृत्य का प्रमुख स्थान है। कथक नृत्यकला प्रत्येक युग में सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों के अनुसार अपना स्वरूप बदलती गई तथा विकास की ओर अग्रसर होती चली गई। कथक नृत्य का इतिहास अनेक परिधियों से घिरा हुआ है। सभी विद्वानों में इसके जन्म को लेकर विभिन्न मत हैं,परन्तु यह निश्चित है कि कथक मंदिरों का नृत्य है तथा यह एक प्राचीन नृत्य शैली है। कथक नृत्य के अंतर्गत ताण्डव की चारियाँ तथा लास्य के अंगहार के तत्व प्राप्त होते हैं। इसमें नाट्य की भावभिव्यक्ति,संगीत का साहचर्य,शास्त्रों के नियम,देशी नृत्यों का अनुशासन का संयोग का दर्शन प्राप्त होता है। मध्य युग में कृष्ण-कथाओं के प्रचार-प्रसार एवं कृष्ण-प्रसंगों का समावेश बहुलता से होने के कारण यह नृत्यनटवरीके नाम से विभूषित किया है।

‘कथक’ शब्द का उद्भव एवं प्रयोग

कथक नृत्य के नामकरण में स्व. रामदासजी का उल्लेख सर्वप्रथम किया जाता है। “यह सत्य है कि भारत की वर्तमान समस्त शास्त्रीय नृत्य शैलियों का नामकरण संस्कार इसी20वीं शताब्दी के चौथे दशक के आसपास हुआ है। उत्तर भारत में सर्वप्रथम मैरिस कॉलेज में नृत्य शिक्षा प्रारंभ होने पर जब (स्व. रामदास जी) कथिक,जो स्वयं शम्भू महाराज के सगे मामा और अयोध्या के पारम्परिक कथक नर्तक थे,शिक्षक नियुक्त हुए और जब अपने नृत्य को कोई नाम देने की आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने ही यहकथक नृत्यनाम दे दिया हो तो इसमें कोई आश्चर्यजनक या असंभव बात नहीं है। इस बात की पुष्टि प्रोफेसर मोहनराव कल्याणपुरकर ने बातचीत के दौरान लेखक को एक घटना सुनाकर की थी।”

‘कथक नृत्य’ के नामकरण के पश्चात् कथक के कई पर्यायवाची शब्द निर्मित हुए हैं जैसे राजस्थान में नर्तकों कोकथक‘,अयोध्या के नर्तकों कोकथित‘,जैन-ग्रंथों मेंकहुबतथा पाली एवं नेपाली शब्दकोषों मेंकथिको। परन्तु वास्तव मेंकथकही शुद्ध शब्द है तथा कथक,कथिक,कथिकों आदि उसके अप्रभंश रूप हैं। “कथक संस्कृत की दशम गण कीकथ्धातु से विनिर्मित एक कृदन्त शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है-कथयति यः सः कथकःकथन अर्थात् जो कथन करता है वह कथक है। पारम्परिक नर्तक भी इसकी व्याख्या करते हैं-कथन करे सो कथक कहावेयाकथा कहे सो कथक कहियेआदि।”

ब्रह्मपुराणमें अभिनेता,गायक तथा नर्तकों के लिएकथकशब्द प्रयुक्त किया गया है।महाभारततथानाट्यशास्त्रमें भी कथक शब्द मिलता है। पाली शब्दकोश मेंकथकोंशब्द मिलता है,जो एक उपदेश के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इसके उपरांत हमारे पौराणिक साहित्य में यह शब्द बहुलता से पाया जाता है। कथक नृत्य के उद्भव को अगर हम देखें तो कथक का पर्यायवाची शब्दकुशीलवप्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम के भवन में जाकर लव कुश ने वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण गाकर अपने अधिकार प्राप्त किए थे,फलस्वरूप इस कथा को गायन के माध्यम से प्रस्तुत कर जनमानस को बहुत प्रभावित किया।

इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए लोगों ने संगीत में कथा करना आरम्भ किया। जिन कथकों,कथाकारों,नटों ने इसे अपनाया वह कुशीलव कहलाए,इसीलिए नाट्य कला के प्रचार हेतु वाल्मीकि ऋषि ही प्रथम कथक कहलाए।

कथक शब्द के प्रयोग की ओर दृष्टिगोचर करें तो अनेक प्राचीन ग्रंथों में कथक शब्द का प्रयोग अभिनेता,नर्तक तथा गायक के लिए उपयोग में लाया गया है। जैसे विष्णु पुराण,अग्नि पुराण,संगीत रत्नाकर,हर्ष चरित,ब्रह्म महापुराण आदि। परन्तु कहा जाता है कि कथक सर्वप्रथम महाभारत ग्रंथ में प्राप्त होता है। कथक नृत्य के उद्भव का इतिहास देखें तो हम कथक को दो प्रमुख खंडों में विभक्त करेंगे- पहला आदिकाल से10वीं शताब्दी तथा दूसरा10वीं शताब्दी से वर्तमान तक की अवधि।

कथक नृत्य का विकास

आदिकाल से10वीं शताब्दी तक की अवधि में कुशीलव अनेक संगीतशालाओं में नृत्य प्रशिक्षण देते थे,नाट्याचार्य बनकर राज कन्याओं तथा रानियों को नृत्य की शिक्षा देते थे। यह कुशीलव स्वतंत्र रूप से कथाओं का प्रचार-प्रसार करने तथा इनके वंश भी इसी कार्य को निरंतर अग्रसर रहते थे। प्राचीनकाल में पारंपरिक रूप से कथावाचकों द्वारा मंदिरों में पौराणिक कथाएं हुआ करती थीं। कथा के पश्चात् कीर्तन में कुछ नट तथा भरत लोकनृत्य करते थे। समय के अनुसार तथा भरत जाति के लोगों में कुछ दूषित तत्वों का समावेश हुआ जिससे वह सामाजिक बहिष्कृत किए गए। इसके पश्चात् उन्होंने स्वयं ही नृत्य के माध्यम से कथा कहना आरम्भ कर दिया। इन नटों तथा भरतों ने अपनी कथा में संवाद को स्थापित किया तत्पश्चात् उसे और प्रभावशाली बनाने हेतु उसमें गीत तत्व को सम्मिलित किया,ब्राह्मण जाति के लोगों की संख्या नटों में अधिक थी इसीलिए यही लोग कथक कहलाने लगे। आचार्यों द्वारा नृत्य के शास्त्रीय सिद्धांतों से परिचित होकर यह सभी समाज में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का नृत्य प्रधाननाटकयास्वांगकिया करते थे। भक्त समुदाय से इनको यश और धन दोनों पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होते थे।”

कुशीलव ने स्वयं को रामायण गान तक ही सीमित न रखकर कालांतर में नाट्य प्रयोग की ओर पग बढ़ाया था और इस क्षेत्र में भी सफलता का वरण कर वे शताब्दियों तक प्रवृत्त रहे।

10वीं शताब्दी से वर्तमान तक में कथक नृत्य भारतीय राष्ट्र में इस्लामिक सत्ता का प्रवेश सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के साथ ही कला जगत में भी इसका प्रभाव दिखा। इस्लामिक सत्ता का भारत के उत्तर राज्यों पर अधिक प्रभाव रहा। जिस कारण कथक नृत्य में अपने प्रदर्शन क्रम तथा अंग संचालन में अनेक परिवर्तन हुए। साथ ही विवशतः यह नृत्य शासकों की विलासिता का साधन भी बना और इसी कारण लोग कथक को मुगलकाल की देन समझते हैं परन्तु वास्तव में कथक नृत्य का एक वर्ग परम्परा अनुसार मंदिरों में ही अपनी सेवा देता था। इस युग की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक उपलब्धि वैष्णव भक्ति संस्थापक चतुः संप्रदाय में से तीन आदि आचार्य विशिष्ट द्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य,द्वैतवादी मधवाचार्य,द्वैताद्वैत के उन्नायक निम्बार्काचार्य के साथ-साथ रुद्र संप्रदाय के प्रवर्तक विष्णु स्वामी का अभ्युदय था। यह इन आचार्यों के उपदेशों व गीत गोविंद के पदों का ही प्रभाव था कि संगीत तथा कथक नृत्यकला में नृत्य की विषयवस्तु सहसा ही विष्णु,विशेषकर कृष्णपरक हो उठी।

डॉ. पुरु दाधीच के अनुसार यद्यपि कथक नृत्य का वर्तमान वृहद रूप अनेक युगों की निरन्तर साधना का परिणाम है और निश्चियतः अपने मूल रूप में वह ऐसा नहीं था जैसा कि आज दिखाई देता है,किंतु यह एक प्रमाणित सत्य है कि उसके बीज लगभग1500 से1000 वर्ष ईसा पूर्व ही अंकुरित हो चुके थे,जो वैष्णव धर्म का आश्रय पाकर क्रम से पल्लवित हुए।”

10वीं शताब्दी का काल भारत देश में इस्लामी सभ्यता के प्रवेश तथा कुशीलवों के पतन का काल कहा जाता है। मुस्लिम सभ्यता के प्रवेश होते ही भारतीय कलाएं अपना स्वरूप बदलती चली गई। मंदिरों से निकली पवित्र कला तथा अपने कथाओं द्वारा धर्म का प्रचार करने के पवित्र उद्देश्य को इस्लामिक शासकों ने अपवित्र कर दिया। मुस्लिम शासकों ने अपनी विलासिता तथा मनोरंजन हेतु नृत्य प्रस्तुतियाँ प्रारंभ करवाई। भारतीय कलाकार भी अपनी प्रतिष्ठा,रोजगार,मान-सम्मान को बचाने के प्रयास हेतु बताये गये अनेक आदेशों का पालन करने लगे। मुस्लिम लुटेरों ने भारत में तबाही मचा दी तथा उनका आतंक सम्पूर्ण भारत में फैल चुका था। मुगल शासकों की लालसापूर्ण करने हेतु नृत्यकला का शोषण होने लगा,जिससे यह कला बाजारूनाचने वालीतक पहुंच गया।

कलाकारों के दो भागों के विभाजन में जहाँ एक भाग मुगल शासकों के अंतर्गत दरबारी शैली में विभाजित हुआ, वहीं देवालयीन शैलीवैष्णव भक्तिकी धारा में प्रभावित हो रही थी।

देवालयीन शैली -

यहीं वैष्णव भक्ति में कलाकार रामाश्रयी शाखा और कृष्णाश्रयी शाखा में विभक्त हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी ने कृष्णाश्रयी कलाकारों के साथ-साथ भक्तिमार्गी कवियों को भी आश्रय प्रदान किया। श्रीमद्वल्लभाचार्य ने समस्त राष्ट्र में कीर्तन द्वारा मंदिरों में कृष्ण भक्ति के प्रवाह को बढ़ाने का प्रयास करअष्टछापकी स्थापना की। इन अष्टछाप कवियों की रचनाओं में कथक नृत्य के तकनीकी शब्दों तथा क्रियात्मक बोलों का अधिकतम प्रयोग हुआ है। यह सभी वही कलाकार थे जो इस्लामिक सभ्यता के प्रभाव के वातावरण से कोसों दूर थे।

कृष्ण भक्त काव्यों का कथक नृत्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है। अष्टछाप कवियों की यह विशेषता थी कि वह कृष्ण-लीला गान से सम्बन्धित पदों का गायन मंदिरों में श्रीकृष्ण की झांकियों के समक्ष प्रतिदिन करते थे,जिससे कलाकारों पर कृष्ण भक्ति भाव का गहरा प्रभाव पड़ा। अष्टछाप कवियों की स्थापना तो हुई ही साथ ही संगीतकर्मियों तथा कथक कलाकारों की भी उचित व्यवस्था हुई। अष्टछाप के कवि प्रायः संगीत के मर्मज्ञ थे। अतः उन्होंने विभिन्न राग-रागिनियों में संगीत में पदों की रचना की,जिसके कारण पदों द्वारा कीर्तन की व्यवस्था करने वाले कीर्तनकारों को संगीत शास्त्रानुसार गान,वाद्य,नृत्य,लय,स्वर आदि का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक था। इस काल में कथक नर्तकों पर कृष्ण भक्ति ने गहरा प्रभाव डाला।

दरबारी शैली -

मुगल शासकों के काल में दरबारी शैली का अत्यधिक प्रभाव रहा है तो वह सिर्फ कला व संस्कृति पर ही पड़ा है। लगभग900वर्ष की इस्लामी सत्ता ने नृत्यकला विशेषकर कथक नृत्य को बहुत प्रभावित किया है। इस्लामिक सत्ता में कथक नृत्य विशुद्ध रूप से विलासिता की सामग्री थी। जो उनके मनोरंजन का साधन मात्र बना,कथक मात्र पान-गोष्ठियों या महफिलों में मनोरंजन के रूप में था। वह कभी दरबारों की शोभा नहीं बन सका। कथक नृत्य का भावपक्ष जहाँ आध्यात्मिक तत्वों से परिपूर्ण था, वहीं मुगलों के आगमन से कथक के भाव पक्षों में उर्दू गजलों और तरानों ने अपना स्थान बना लिया। उन्होंने भारतीय नृत्यों की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का सम्मान न कर देवदासियों को बंदियाँ बनाकर अपने दरबारों में नाच प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध किया। कथक नृत्य में नृत्य के पूर्व भगवान के प्रति की जाने वाली स्तुति ने सलामी का रूप ले लिया। कथक की वेशभूषा में भी परिवर्तन कर दिया गया। कथक नृत्यकला अब विलास का साधन बन चुकी थी। हिन्दू और मुस्लिम दरबारों में उनके शासकों के लिए मनोरंजन के तौर पर कथक नृत्य के “नृत्तांग” का विस्तार हुआ जिसमें ताल-लय का कार्य,तोड़े,टुकड़े,परन,ततकार आदि का विकास हुआ और वहीं मुस्लिम दरबारों में कथक के अंगों का विकास होता रहा।

जहाँ कृष्णाश्रयी शाखा का केंद्र वृंदावन था। वहीं रामाश्रयी शाखा का केंद्र अयोध्या रहा। कृष्ण भक्ति धारा के कथक कलाकारों द्वारारासलीलानृत्य का सृजन एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। रास और लीला दोनों ही एक-दूसरे से भिन्न है। रास शब्द की रचना वल्लभ नामक नर्तक ने15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में की थी। वहीं रामाश्रयी शाखा के कथक नर्तक भगवान राम को अपना इष्ट मानकर नृत्य किया करते थे। अतः उन्होंने राम,सीता व सखियों के झूलन विहार,वसंत विहार आदि अनेक संबंधित प्रसगों की रचना की।

जैसे-जैसे युग बदला कथक का स्वरूप बदलता गया। जहाँ सूरदास,तुलसीदास,नंददास,मीराबाई आदि प्रतिभावान कवियों का उदय हुआ,साथ ही उनकी पदावली कथक नृत्य का आधार बनी। इन पदों और कीर्तनों में कथक नृत्य के तकनीकी शब्दों का बहुलता से प्रयोग हुआ। मंदिरों में नृत्य-संगीत के माध्यम से ईश्वर स्तुति हुआ करती थी। जिस कारण कथक नृत्य के तकनीकी शब्दों और नृत्य के क्रियात्मक बोलों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि सामान्य जनसमाज भी कथक नृत्य के तकनीकी शब्दों और बारीकियों को सरलता से समझ पाया तथा साथ ही कथक नृत्य प्रचलित भी होता रहा।

धार्मिक और दरबारी प्रवृत्तियों के स्वस्थ सम्मिश्रण से ही विगत पाँच सौ वर्षों में क्रमिक रूप से कथक नृत्य का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ है। आरम्भ के दो-ढाई सौ वर्षों तक तो इसका धार्मिक रूप बना रहा किंतु17वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही समस्त राजा-रईसों के विलासिता में डूब जाने का प्रभाव कला-रूपों पर भी पड़ा। हम देखते हैं कि नायिका भेद का वर्णन उसी युग की कविता का मुख्य विषय था,जो तत्कालीन लघु चित्रों में भी व्यक्त हुआ और यही कवित्त-छंद कथकों को भाव दिखाने के लिए भी दिए गए,जो कथक नृत्य का अपरिहार्य अंग बन गए। तद् युगीन ठुमरियों में भी राधा-कृष्ण की छेड़-छाड़ के स्वर प्रमुखता से मुखरित है।” यहाँ तक कि उस समय गीतों में भगवान राम भी धीरोदात्त से धीर ललित नायक बन गए। हालांकि अपने आराध्य देवों के चिर रति-विलास की पृष्ठभूमि में वैष्णव की अपनी दार्शनिक मान्यताएं भी हैं,किंतु लौकिक स्तर पर यह उस श्रृंगार युग का ही प्रभाव था।

हिंदी साहित्य की रीतिकालीन परम्परा में मुख्यतः रचा-पचा कथक नृत्य ही हमें धरोहर में प्राप्त हुआ है। किंतु अब इस पर घरानेदारों का ही एकाधिकार नहीं रहा है। भद्र परिवारों के युवक-युवतियों ने भी इसमें क्रियात्मक रूप से रुचि लेना एक अरसे से प्रारंभ कर दिया है,जिसके परिणामस्वरूप इसके सैद्धांतिक पक्ष की भी चर्चा प्रारंभहुई है और इसकी विद्यालयीन शिक्षा-प्रणाली का सूत्रपात हुआ है। कथक महफिलों से निकलकर जनमंच पर तो स्वतंत्रता से पूर्व आ गया था,आज इसके कलाकारों में एक बड़ी संख्या गैर-घरानेदारों की है। आज जनमंच पर कथक नृत्य ने अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कथक नृत्य की लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी सुदीर्घ परम्परा है। यह नृत्य भारत के समस्त सांस्कृतिक उत्थान-पतन का पारदर्शी है। इसीलिए इसमें इतना वैविध्य है,इतनी उन्मुक्तता है,इतनी ताजगी और जीवंतता है।” एक ओर कथक विलासी राजाओं के मनोरंजन हेतु प्रयोग होने लगा,उसमें श्रृंगार तत्वों तथा नायिका प्रधान तत्वों को अधिकतर प्रयोग में लिया जाने लगा। धीरे-धीरे कथक नृत्य का स्तर बहुत ही निम्न होने लगा,कथकों को वैश्याओं के प्रशिक्षण जैसे हल्के स्तर पर पहुँचा दिया गया।

वहीं दूसरी ओर वैष्णव संप्रदाय की धारा में बहे कथक नर्तकों में सात्विक तथा आध्यात्मिक चेतना का विकास हुआ। भारतीय शास्त्रीय कथक नृत्य ने हर युग में परिस्थितियों के अनुसार अनेक रूपों को अपनाया है। मंदिरों से निकला यह नृत्य अनेक राजाओं-शासकों के दरबारों में पहुँचकर जन मंच तक अपने नए रंगों और रूपों को अपनाते हुए पहुँचा है। समय के साथ-साथ इन बदलाव में कथक नृत्य में घरानों का सृजन हुआ जिनमें मुख्यतः बनारस घराना,जयपुर घराना,लखनऊ घराना तथा रायगढ़ घराना प्रसिद्ध है।

कथक नृत्य के प्रदर्शन क्रम को दो भागों में बांटा हैजिसमें प्रथम भाग में कथक नर्तक नृत्य के तकनीकी पक्ष को जिसमें तोड़े,टुकड़े,ततकार,परन आदि को समावेश करता है,प्रदर्शित करता है तथा दूसरा भाग नृत्य के भावपक्ष से सम्बन्धित होता है।

कथक नृत्य की विधा में उसके प्रदर्शन क्रम की बात करें तो प्रस्तुति के आरम्भ में स्तुति तथा प्रदर्शन के अंतिम चरण में भावपक्ष की अहम् भूमिका होती है,और कथक नृत्य में भावपक्ष का आधार होती है- ठुमरी,होरी,कजरी,भजन,चेती,चतुरंग आदि परन्तु कथक नृत्यों में भाव-प्रदर्शन का मुख्य आधार विगत दो सौ वर्षों से “ठुमरी” नामक गीत प्रकार रहा है।

भाव प्रदर्शन के पश्चात् कुछ नर्तक अपने नृत्य का समापन द्रुत लय गति से करना चाहते हैं,इस हेतु वे तराना प्रस्तुत करते हैं। तराना फारसी भाषा का शब्द है। इसमें तबले पखावज के बोलों के साथ कभी-कभी सरगम का भी प्रयोग होता है। तराना निरर्थक बोलों से बनी ऐसी रचना है जिसे द्रुतगति में नाचा जाता है। तराने में प्रयुक्त किये जाने वाले बोल,लय, गति तथा नर्तक के द्रुतगति में किए गए अंग विन्यास चमत्कारपूर्ण प्रभाव की सृष्टि करते हैं।”

प्रस्तुति – डॉ. निवेदिता पंड्या
कथक नृत्य विशेषज्ञा