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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands. You just go to and do your best.
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पर्यावरण – परि + आवरण = पर्यावरण। अर्थात् वातावरण या परिस्थिति।
पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है – वह जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है जिस परिवेश में हम रहते हैं, उसे पर्यावरण कहते हैं । जीवित प्राणियों के लिये पर्यावरण एक बुनियादी आवश्यकताओं में से एक महत्वपूर्ण घटक है । पर्यावरण उन सभी प्राकृतिक स्थितियों, रचनाओं, परिस्थिति तंत्र एवं वस्तुओं से निर्मित होता है, जो हमारे-चारों चारों ओर व्याप्त है ।पर्यावरण की रचना – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति (पेड़-पौधे), जीव-जन्तु और व्यक्ति सभी अंतः क्रिया में – पर्यावरण के घटक है।
पर्यावरण का सम्बन्ध प्राकृतिक दुनिया से है । पर्यावरण न केवल जलवायु का संतुलन सुनिश्चित करता है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र की हर एक आवश्यक चीज प्रदान करता है। भूमि, नदी, तालाब, वायु, पेड़-पौधे, पशु पर्यावरण का निर्माण करते हैं। पर्यावरण जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समूह से निर्मित इकाई है।
यह समूची पृथ्वी के प्राणीमात्र के जीवन के चारों ओर व्याप्त रहकर सभी को धेरे रहता है । जो जीवों के रूप, जीवन और उनके जीवित रहने की स्थिति को सुनिश्चित करता है। इस तरह धरती पर जीवन की हर एक स्थिति, घटना पर्यावरण के कारण संपादित होती है ।
पर्यावरण एक वैश्विक मुद्दा है। यह गंभीर बीमारियों का स्त्रोत भी बन चुका है । अतः पर्यावरण शुद्धि के लिये सूक्ष्म जीवों के प्रसार को रोकने लिये स्वच्छता और सफाई रखना अनिवार्य है।
पर्यावरण के मुख्य प्रकार है – भौतिक, जैविक और सामाजिक । प्राकृतिक या भौगोलिक पर्यावरण मूल रूप से प्रकृति से ही आता है। सांस्कृतिक और सामाजिक पर्यावरण मानव निर्मित होता है । इसके अतिरिक पर्यावरण के अन्य प्रकार होते हैं- जलीय, स्थलीय, वायुमंडलीय, भूमिगत और अंतरिक्ष ।
जहाँ एक ओर पर्यावरण हमें प्रभावित करता है वहीं दूसरी ओर मानव भी अपने शुद्ध – अशुद्ध नकारात्मक भावों, विचारों, कल्पनाओं, संकल्पों, कर्म-क्रियाओं द्वारा वातावरण का निर्माण कर प्रभाव डालते रहते है।
धरती पर सभी प्राणियों में चेतना के विकास की दृष्टि से मानव सबसे विकसित प्राणी है। उसमें अनंत क्षमताएँ और संभावनाएं निहित है। अर्ध विकसित चेतना या निम्न चेतना के मानव पर्यावरण के लिये खतरा पैदा करते हैं। इससे अन्य प्रजातियों, प्राणियों को खतरा बना रहता है। वहीं उच्चतर या उच्चतम चेतना में स्थित मानव पर्यावरण के लिये वरदान होते हैं, वे पर्यावरण को सकारात्मक और दिव्य बनाने में सार्थक भूमिका का निर्वहन करते रहते हैं।
ऐसे मानव सदैव धरती के वातावरण में प्रेम, शांति, एकता, आनंद और दिव्यता की सुगंध भरते रहते हैं । इनका एक मात्र उद्देश्य होता है-‘वसुधैव कुटुम्बकम् ।‘अर्थात् विश्व एक परिवार है। सभी को जीने का अधिकार है । सभी सुख, शान्ति, प्रेम, और आनन्द से जीवन जीये, इसकी पूर्ति के लिये वे नित-निरन्तर अपने आंतरिक-बाह्य प्रयास, साधना, कर्म तथा ज्ञान के साथ इसे अक्षुण्य बनाये रखने के लिये अपनी दिव्य संकल्प शक्ति, प्रार्थना और अखंड अभीप्सा का प्रयोग करते रहते हैं।
श्रीमाँ ने लिखा है – ” जब कोई उच्चतर चेतना में निवास करता है, तो वह जो भी भी करें, सोचे या बोले, उसमें उस उच्चतर चेतना के स्पन्दन प्रकट होते ही हैं। इस व्यक्ति की धरती पर उपस्थिति-मात्र से ही उच्चतर स्पन्दन व्यक्त होते हैं।’
जब किसी का वातावरण हानिकर तथा प्रभाव बुरा होता है तो तुम्हें इस बात की बहुत सावधानी बरतनी चाहिये कि उस वातावरण में ध्यान के समय अपने-आपको ग्रहणशीलता की अवस्था में न रखो।
प्रश्न- दूसरों का वातावरण अनुभव करना जरूरी है क्या?
ज्यादा अच्छा है कि उसका तब तक अनुभव न करो जब तक तुमने समस्त गलत स्पन्दनों को ठीक करने की शक्ति न पाली हो।
