दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार एक पूर्ण श्रृंखला-बद्ध गतिशील, संतुलित, वैज्ञानिक व्यायाम की अभ्यास पद्धति है। इसका सही और उचित ढंग से अभ्यास करने से हमारे शरीर के बाह्य और आंतरिक अंगों में खिंचाव उत्पन्न होता है, अंग लचीले बनते हैं। अंगों की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।

सूर्यनमस्कार करनेसे संपूर्ण शरीर की सभी कार्य – प्रणालियाँ संतुलित, सुगठित तथा सामंजस्य पूर्ण बनती है। शरीरमेंऊर्जा और सौन्दर्य की वृद्धि होती है।

सूर्य – महिमा

प्रश्न – सूर्य की शक्ति का प्रभाव और महिमा क्या है ?

अनादिकाल से सूर्य की आराधना,उपासना होती रही है । सूर्य नमस्कार करने के पूर्व प्रत्येक को यह ज्ञान होना चाहिये कि सूर्य की शक्ति अपरिमित है । वेद, उपनिषद, पुराण,ब्राहम्ण-ग्रंथों, महाभारत, रामायण में सूर्य की अनंत महिमा का वर्णन है । भविष्य पुराण में कृष्ण-पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग,पद्म पुराण में महाराजा भद्रेश्वर को श्वेत कुष्ठ,सूर्य शतक के रचियता मयुर कवि के कुष्ठ रोग को सूर्य आराधना से पूर्ण छुटकारा मिलने का स्पष्ट वर्णन है। सिकंदर के समय भारत से सूर्य-विज्ञान यूनानी अपने साथ ले गये। वहाँ से रोम, मिस्त्र, ईरान आदि देशों में सूर्य विज्ञान फैलता चला गया। रोम में 600 वर्षों तक बिना किसी चिकित्सक के केवल सूर्य-किरणों और सूर्य उपासना से रोम निवासी चिकित्सा लेते थे । मध्यकाल में भारत पर विदेशी आक्रमणों ने सूर्य-मंदिरों को जलाकर, सूर्य-विज्ञान नष्ट कर दिया । सूर्य-विज्ञान में सूर्य-स्नान, सूर्य-ऊर्जा, सूर्य-दर्शन, सूर्य-किरण चिकित्सा,सूर्य उपासना और सूर्य नमस्कार के वैज्ञानिक व्यायाम का प्रयोगात्मक वर्णन है पाश्चात्य वैज्ञानिक और चिकित्सक सूर्य की ऊर्जा शक्ति के सफल प्रभाव को मानव शरीर पर देखकर आश्चर्य चकित हुए, उन्होंने इस पर कई पुस्तकें लिख डाली विशेषकर लुई-कुने, रिक्ली,जस्ट, कैलाग, फिनसेन, रोलियर, स्टकर, ईब्स, बर्नर मैकफैडन ने सूर्य-विज्ञान पर शोध और प्रयोग करके इसकी महिमा को मानव मात्र को बताया। हमारे ऋषि-मुनियों के गौरव को पुन: जीवित किया। सूर्य उदयकाल से ही अपनी सशक्त ऊर्जा द्वारा लोगों को अपने-अपने कर्म में लगा देता है। सूर्य में प्रचंड प्रकाश है, जो समूचे अंधकार को निगल लेता है । सूर्य के प्रचंड ताप से वायु संचरित होकर प्रकृति शुद्ध होती है। सूर्य किरणों से खारा समुद्र जल वाष्प बनकर पृथ्वी पर मीठा जल बरसता है। जड़ जगत, प्राणी जगत, वनस्पति, पशु-पक्षी, मानव सब सूर्य की ऊर्जा से जिंदा है । सूर्य की ऊर्जा के बिना मनुष्य पीले पड़ जाते हैं । सूर्य में अमृत शक्ति है। संसार के विकसित सौंदर्य के पीछे सूर्य की प्रचंड शक्ति है । हमारे चारों ओर जो भी पनप रहा है, बड़ा हो रहा है, विकसित और शुद्ध हो रहा है वह सूर्य प्रकाश के कारण ही है । उदय और अस्त होता हुआ सूर्य पृथ्वी के किटाणुओं का नाश करता है । इसी से स्वास्थ्य खिलता है

संयोजन : सुमन कोचर

जीवन और योग

अगर हम जीवन और योग दोनों को यथार्थ दृष्टि से देखें तो समस्त जीवन ही चेतन या अवचेतन रुप में योग है। कारण, इस शब्द से हमारा मतलब सत्ता के अंदर प्रसुप्त क्षमताओं की अभिव्यक्ति के द्वारा आत्म-परिपूर्णता के लिये किया गया विधिबद्ध प्रयत्न और मानव-व्यक्ति का उस विश्वव्यापी और परात्पर सत्ता के साथ मिलन है जिसे हम मनुष्य और विश्व में अंशत: अभिव्यक्त होता हुआ देखते हैं।  किन्तु जब हम जीवन को उसके बाह्य रूपों के पीछे जाकर देखते हैं तो वह प्रकृति का एक विशाल  योग दिखाई देता है। उन रूपों के द्वारा प्रकृति अपनी शक्यताओं की सदा-वृद्धिशील अभिव्यक्ति में अपनी पूर्णता प्राप्त करने की तथा अपनी दिव्य वास्तविक सत्ता के साथ एक होने की चेष्टा कर रही है। मनुष्य उसका एक विचारशील प्राणी है, अतएव, उसमें वह पहली बार क्रिया के उन स्व-चेतन साधनों और इच्छाशक्ति से युक्त प्रणालियों की रचना करती है जिनकी सहायता से यह महान् उद्देश्य अधिक द्रुत और शक्तिशाली वेग से पूरा हो सकेगा ।

- श्रीअरविन्द
‘योग समन्वय’ पृ.४

योग “ सारा जीवन ही योग है। ’’ श्री अरविन्द

सम्पूर्ण विश्व में भारत एकमात्र अध्यात्म का केन्द्र रहा है। अनेकों ऋषियों, मुनियों एवं योगियों ने शरीर, प्राण, मन और आत्मा को शक्तिशाली बनाने हेतु कतिपय प्रयोग कर एक विद्या का अविष्कार किया, यही ‘योग’ कहलाया ।

‘योग’ शब्द संस्कृत के ‘युज’ धातु से बना है । जिसका अर्थ है – बांधना, युक्त करना, जोड़ना,  मिलाना । संयोग और मिलन भी ‘योग’ के अन्य अर्थ है ।

गीता के अनुसार –

समत्वं योगं उच्यते ।

समत्व में रहना ही योग की उच्च स्थिति है ।

योग: कर्मसु कौशलम्

पूर्ण निष्काम भाव एवं सचेतनता से किए गये कर्म में कुशलता और परिपूर्णता होती है । कर्म में सजगता, सचेतनता, निपुणता कर्तव्य भावना, फल की इच्छा से रहित स्थिति, अनासक्त भाव, अहं और कर्त्ता भाव से ऊपर उठकर, भगवान की सत्ता के रूप में, भगवान का यंत्र बनकर, भगवान को अर्पण करते हुए, यज्ञ अनुष्ठान के रूप में, सर्वोच्च शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से, पूर्णता से किया गया कर्म हीयोग: कर्मसु कौशलम् की श्रेणी में आता है ।

सर्वाणि कर्माणि कृतस्न्कृत:

एक सिद्ध योगी चाहे जिस भी तरह से रहे, चाहे जिस भी तरीके से कर्म करें, वह सदा ईश्वर में ही रहता और कर्म करता है ।

मानव जीवन में कर्म का चुनाव करने वाला प्रेरक, उसका दिशा – निर्देश करने वाला संचालक, शासक, स्वामी , शक्ति सब कुछ भगवान ही है ।

जिस दिन मानव सरलता से उस वैश्व शक्ति के प्रति सचेतन हो जाये और अपने समस्त कर्मों का सच्चा कर्ता – नियंता उसे मान ले तभी वहयोग: कर्मसु कौशलम् के सत्य को जान सकेगा । कर्मयोग का यही पूर्ण आदर्श है l

योग क्या है ?

योग मानव जीवन में सत्य जीवन जीने की उच्चतम विधा है । सत्य शिक्षा है । सत्य कला है । योग धरती पर जीवन को जानने, जीने और विकास करने का विज्ञान है । एक मनुष्य के लिये योग अपने-आपको जानने, अपनी आत्मा को पाने और ‘वही’ बन जाने की विधा है ।

योग करके मनुष्य अपनी अंतः – बाह्य शक्तियों की क्रियाओं – प्रतिक्रियाओं से परिचित होते हैं । इनकी शुद्धि और विकास करके उन्हें प्रकाशित करते हैं । इन्हें नवीन बनाकर अपने अंदर आत्मसत्ता और आंतरचेतना की ओर खुलते हैं । दिव्य शक्ति से जुड़कर मानव अपनी सत्ता के समस्त स्तरों – शरीर, प्राण, मन, भाव केंद्र तथा चेतना के रूपांतरण तथा उसमें देवत्व की अभिव्यक्ति के विज्ञान से परिचित होते हैं ।

कठोपनिषद् में योग –

जब पांचों इन्द्रियाँ मन के सहित निश्चल हो जाती है, बुद्धि का व्यापार भी रुक जाता है, यह ‘योग’ की विशेष स्थिति है ।

महर्षि चरक ने मन का इन्द्रिय विषयों से पृथक होकर आत्मा में स्थिर होने की स्थिति को ‘योग’ कहा है ।

भारत की तपोभूमि के कण-कण में आध्यात्मिक शक्ति की प्रत्यक्ष उपस्थिति विद्यमान है। अतः दिव्य दृष्टा योगी इसके अंदर साक्षात् माँ का दर्शन करता है। संपूर्ण विश्व की आध्यात्मिक जननी !

       प्राचीन और अध्यात्म प्राण भारत वर्ष में क्रम-क्रमश: अनेक विधाएँ और प्रणालियाँ मानव की साधना के लिये प्रचलित हुई। विशेषकर- हठयोग, राजयोग, त्रियोग – ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, तांत्रिकयोग- आदि। सभी योग पद्धतियों की अपनी विषेषताएँ,  विशिष्ट शक्तियाँ, उपलब्धियाँ और सीमित प्रभाव है।

       श्री अरविन्द के अनुसार –आज योग गुप्त संस्थाओं और सन्यासियों की गुफाओं में से निकलकर मानव मात्र तक पहुँच गया है। इसकी क्रियाएँ दावा करती है कि वे मानव को स्वस्थ, दीर्घायुषी जीवन के लिये तैयार कर उसके अंतरतम गुप्त कक्ष तक अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व की उच्चतम चोटी तक ले जायेगी। यदि हम जीवन और योग दोनों को यथार्थ दृष्टिकोण से देखें तो संपूर्ण जीवन ही चेतन या अवचेतन रूप से योग है।

       योग का अर्थ है –अपने अहं को हटाकर भगवान के साथ एकत्व प्राप्त करने की चेष्टा करना । मनुष्य के अंदर जब भगवान का स्पर्श होता है तब उसे योग कहते हैं l

योग के स्तर -

योग का पहला स्तर है – शरीर और शरीर को जीवित रखने वाली जीवन शक्ति या प्राण शक्ति ।

दूसरा स्तर है – मन, इसी ऊर्ध्वतर क्षेत्र में बुद्धि, विचार, चिंतन, भावुकता इत्यादि के खेल मानव के अंदर चलते हैं ।

तीसरा स्तर है – अध्यात्म बोध, जिसका स्वरूप है – विज्ञानमय, आनंदमय, जहां अमृत्व का भंडार है ।

योग का आदर्श है – दिव्य जीवन को अपने अंदर अभिव्यक्त करना । योग का मूल उद्देश्य है, मनुष्य के अंदर जो शक्ति मनुष्य को पशुभाव और मनुष्य भाव से ऊपर उठाकर देवभाव में स्थापित करना चाहती है उसी का नाम योग शक्ति है और इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए जिस मार्ग पर चलना होता है । इस मार्ग पर चलना और जीवन को गढ़ना ही साधन है ।

श्रीअरविन्द कहते हैं – वास्तव में मानवजाति के दु:ख तो उसकी चेतना के साथ बंधे हुए हैं । इसका मूल तो उसकी निम्न प्रकृति में स्थित है ।

यदि मानवजाति के दु:खों का अंत करना है तो एक ही उपाय है और वह है – मनुष्य की चेतना में भगवान का प्रकाश उतारने की साधना करके उसका रूपांतरण करना ।

यह मार्ग है ‘प्रकृति के दिव्य रूपांतरण का ताकि दिव्य जीवन जीने की संभावना का मार्ग प्रत्येक मानव अपने अंदर खोज सके ।’ पूर्णयोग अर्थात् भगवान को अपने अंदर सक्रिय करने की साधना । हमारी एक-एक गति, एक-एक विचार में भगवान की शक्ति प्रकट होती रहे, इस स्थिति को प्राप्त करने की प्रक्रिया है ‘पूर्णयोग’ । वास्तव में हम सब भगवान ही हैं किंतु वास्तव में अज्ञानमयी प्रकृति से आच्छादित है । मानव ने अज्ञानमयी प्रकृति का बुरखा ओढ़ रखा है । इसी अज्ञानमयी प्रकृति के बुरखे को हटाने की प्रक्रिया की विधा है पूर्णयोग । भगवान की अनंत शक्तियां है – सत्य, प्रेम, प्रकाश, सौंदर्य और आनंद । इन सबके विषय में मानव मात्र को जाग्रत होना होगा । श्रीअरविन्द की पूर्णयोग साधना पद्धति में किसी भी मनुष्य को जगत् त्यागने, और वेशभूषा बदलकर रहने, कोई धर्म-जाति परिवर्तन, देह-दमन, इंद्रियों का दमन, उसके कार्यों पर कठोर नियंत्रण आदि जैसी कोई बात नहीं हैं । न हीं इस जगत को मिथ्या, भ्रम, भ्रांति का घर मानकर छोड़ने तथा पलायन करने की आवश्यकता है । यदि एक बार मानव के अंदर अभीप्सा जाग्रत भर हो जाये कि मुझे अपने अंदर परम प्रभु की शक्ति को खोजना और पाना है और पल-पल उसे अभिव्यक्त करना है अपनी चेतना के आमूल-चूल रूपान्तरण की निरंतर चाहना तथा आंतरिक अभीप्सा करते रहने से इस योग का जागरण हमारे अंदर स्वत: हो जाता है । जीवन धीरे-धीरे दिव्यता में रूपांतरित होने लगता है ।

मानव की सामान्य चेतना का प्रभु की चेतना में दिव्य रूपांतरण करना ही पूर्ण योग का दिव्य लक्ष्य है । केवल आवश्यकता है मानव अपने क्षुद्र अहंकार, पूर्वाग्रहों तथा छोटी-मोटी मांगों से अपने-आपको उठाकर केवल भगवान के लिए जीये, केवल भगवान के दिव्य गुणों को अपनी प्रकृति में उतारे ।

पूर्णयोग का आधार है – स्थिरता, शांति और समता। क्योंकि चंचल मन में योग की नीव रखना संभव नहीं है। जब तक मानव मन पूर्णतया अचंचल न हो या उसके अंदर मन की पूर्णशुद्धि का संकल्प न हो तब तक दिव्य संस्कार मानव के अंदर स्थिर नहीं हो सकते।

दूसरा – अंदर मन में शांति स्थापित हो ताकि मन में सत्य चेतना का निर्माण सहज होने की स्थिति आ जाये।

तीसरा – समता। ‘समत्वं योगं उच्चते’। समता के विकास के बिना मनुष्य योग में प्रतिष्ठित नहीं हो सकता।

उसके जीवन की परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हो विपरीत या अनुकूल । दूसरों का व्यवहार जितना भी नापसंद का हो। आवश्यकता है पूर्ण स्थिर समता के साथ बिना क्षोभ के, बिना किसी प्रतिक्रिया के, शांति के साथ उन्हें ग्रहण करना सीखना। इन्हीं चीजों से समता की परीक्षा होती है। स्वयं के परीक्षण के द्वारा मनुष्य अधिक दृढ़तर और पूर्णतर समता को प्राप्त कर सकता है।

जब अभ्यास के द्वारा मानव के अंदर सच्ची शांति, स्थिरता और समता आ जाती है तब उसका अहंकार गलकर विलुप्त होने लगता है। साक्षीभाव आता है। भागवत शक्ति के साथ सहज घनिष्ठ संबंध स्थापित हो जाता है। एक मात्र भगवान के प्रभाव में रहकर ही वह योगयुक्त जीवन जीने की तैयारी करता है।

योग के आध्यात्मिक आधार है – श्रध्दा, अभीप्सा, परित्याग, आत्मोद्घाटन और समर्पण। मानव मन में सच्ची श्रध्दा से भगवान के ऊपर निर्भरता, उनकी शक्ति के प्रति समर्पण, प्रेम और आत्मदान सहज प्रकट होता है।

भगवान को पाने के लिये मानव के अंदर से उठने वाली तीव्र अभीप्सा मानव के अंतर को उसकी दिव्य शक्ति की ओर खोल देती है। भागवत सत्य की विरोधी चीजों को मानव के अंदर प्रवेश नहीं होने देती। इस तरह बालक जैसे सच्चे हदय के सरल संकल्प के साथ खुलकर ही मानव निम्नतम शक्तियों पर विजय प्राप्त कर उच्चतम तत्व को अपने अंदर प्राप्त करता है।

यह सुनिश्चित सत्य है कि पूर्ण समर्पण या आत्मसमर्पण करना संभव नही। क्योंकि आत्मसमर्पण का अर्थ है अपनी सत्ता के प्रत्येक भाग में से अहं की ग्रंथियों को जड़ से काटकर बाहर फेंक देना। सीधे शब्दों में भगवान कोई खिलौना नहीं कि मानव के हाथों में ऐसे ही खेलने के लिये दे दिया जाये। जब तक मानव अपने को अंदर के अंहकार तथा अज्ञानमय चीजों से स्वयं मुक्त नहीं कर लेता वह योगपथ का पथिक कदापि नहीं बन सकता।

श्री अरविन्द के अनुसार – योग का एक अतिमहान् और दिव्य लक्ष्य तथा उद्देश्य है – ईश्वरीय उपस्थिति तथा चेतना में प्रविष्ट होकर उसके अधीन होना । केवल ईश्वर के लिये ईश्वर से प्रेम करना, मानवीय प्रकृति को ईश्वरीय प्रकृति में रूपांतरित करना एवं अपनी इच्छा, कार्य एवं जीवन द्वारा ईश्वर का साधन बनना ।

किंतु पृथ्वी पर वह कौनसी विधा है, जिसके अभ्यास द्वारा हम जीवन को सम्पूर्ण बना सकते हैं ? एक व्यक्ति का सर्वोत्तम कार्य क्या है ? इस संसार में रहते हुए प्रतिदिन के अपने समस्त छोटे से छोटे तथा बड़े सभी कर्म करते हुए हम योग साधना कर सकते हैं ? यहाँ तक कि मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकते हैं। अपना भाग्य बदल सकते हैं। क्या दिव्य शरीर और दिव्य जीवन प्राप्त कर सकते हैं ?

वास्तव में जगत् विकास की प्रक्रिया से आगे बढ़ रहा है। जड़-पदार्थ से वनस्पति, वनस्पति से पशु और पशु से मानव। लेकिन मनुष्य विकास क्रम में अंतिम चरण नहीं है। उसे क्रम-विकास में इससे आगे मानव से अतिमानव तक बनना है।

लेकिन प्रश्न है- सोपानों की इस यात्रा में वह मानव से अतिमानव कैसे बनेगा ? एक सहज और सरल उत्तर है – यदि मानव पूर्णतया आध्यात्मिक होना स्वीकार कर ले। इसके लिये उसे इस सुंदर जगत् को छोड़ने या पलायन करने की आवश्यकता नहीं बल्कि इसी जगत में रहते हुए समस्त कर्मों को शांत स्थिति में करते हुए ‘सत्य चेतना’ में जीवन जीना। तब उसका सारा जीवन ही योग बन जायेगा। तब धरती पर सामान्य मानव रूप में ‘सत्य चेतना’ में प्रतिष्ठित पूर्ण प्रकाशमान मानवीय दिव्य देह चलती-फिरती दर्शन होगी।

योग का क्षेत्र अत्यंत विशाल है। योग प्रदर्शन का विषय नहीं बल्कि दर्शन का विषय है । केवल शरीर की कुछ कलाबाजियों का नाम योग नहीं है। बल्कि शरीर, प्राण, मन, अंतरात्मा तथा आत्मा की सभी क्रियाओं को करते हुए भागवत शक्ति के प्रकाश में, अपने को शुद्ध करना, रूपांतरित करना तथा उसमें भगवान को अभिव्यक्त करना ही पूर्ण योग है। सच्चे योग की अभिव्यक्ति ही मानव को योगी बना सकती है।

वास्तव में जबसे मानव धरती पर आया है तभी से वह योग द्वारा अपने अंतरस्थ पूर्णअंशी, अपनी दिव्य सत्ता के साथ अपने-आपको एक करने में प्रयत्नरत है। अतएव, मानव ने उस परम के साथ एक होकर अपने अंदर सुप्त क्षमताओं, संभावनाओं, शक्तियों को योग की विशिष्ट प्रणालियों की क्रियाओं द्वारा जाग्रत कर योग की गुह्य सिद्धियों को पाने का प्रयास किया । हम सब जानते हैं कि योग शरीर में ही सम्पन्न होता है। इसके लिये पूर्ण आंतरिक निष्कपटता और नख से शिख तक पूर्ण सच्चाई तथा शुद्धि की आवश्यकता होती है।

योग मानव शरीर का एक नैसर्गिक ( प्राकृतिक ) गुण है ।

महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अर्थ है –

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । ( पातंजल योग सूत्र 1.2 )

मानव चित्त अर्थात् अंतःकरण की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है ।

महर्षि पतंजलि  ने प्रत्येक को आंतरिक और बाह्य विकास हेतु अष्टांग योग की आठ सीढ़ियों – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की विशिष्ट क्रियाओं का निरंतर अभ्यास करने की विधा की आवश्यकता बताई है। इन आठ अंगों की विशिष्ट क्रयाओं का अभ्यास करके मानव स्वस्थ, सुखी और आनन्दमय जीवन जी सकता है । आज समूचे विश्व में अधिकांश लोग अष्टांग योग की क्रियाओं में विशेष रूप से केवल आसन-प्राणायाम की क्रियाओं के अभ्यास तक सीमित है। निश्चित रूप से आसन-प्राणायाम या अन्य शारीरिक अभ्यास से प्राण ऊर्जा तेजी से बढ़ती है। अवचेतना में रहने के कारण मानव में कामवृत्ति भी आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ जाती है। यह ऊर्जा संतुलित रूप से कार्य करे इसके लिये यह अत्यंत आवश्यक है कि आंतरिक प्रवृत्तियों के प्रति सचेतन सावधान रहा जाये। इनसे अपने-आपको अलग कर लिया जाये।

जब योग में इतनी विशाल ऊर्जा की अक्षय शक्ति है तो सहज ही एक जिज्ञासा होती है कि योग शुरू कहाँ से करें? ताकि योग का सही अध्ययन और अनुभव प्राप्त कर योग के सच्चे अधिकारी बन सकें । सच्चे अर्थ में योग सीखने के लिये सबसे पहली चीज़ है – योग के लिये एक आंतरिक दृढ़ संकल्प के साथ अभीप्सा और प्रार्थना उठनी चाहिये । हे भगवान ! मैं योग करना चाहता हूँ, मुझे मार्गदर्शन प्रदान करो ।

आसन, प्राणायाम के अगले क्रम – प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के लिये गुह्य ज्ञानवान और योग्य गुरू का सतत सान्निध्य अत्यावश्यक है। योग से दिव्य शक्तियाँ जाग्रत होती है यह सत्य है। किंतु आंतरिक विकार भी मानव सत्ता पर प्रकट होते हैं। इनकी शुद्धि भी आवश्यक है। समूची मानवसत्ता में से इनके अतिक्रमण के लिये, रूपांतरण के लिये, किसी योग्य औेर दिव्य गुरू का सतत मार्गदर्शन और संभाल आवश्यक है। गुरू की दिव्य शक्ति, उपस्थिति और संकल्प ही साधक के इन आंतरिक विकारों से हर पल रक्षा और सहायता कर सकते हैं।

  यह एक गुह्य तथा शक्तिशाली आध्यात्मिक विज्ञान है। जिसे योग साधना के दौरान साधक भी नहीं समझ पाता कि गुरू की अपार कृपा कैसे उस पर अमृत वर्षा कर उसे विकारों से मुक्त कर दिव्य बना रही है । अपने अंदर शांति के साथ भगवान के साथ युक्त रहने का, अपनी प्रकृति पर नियंत्रण करते रहने का, निरंतर और सचेतन अभ्यास किया जाये । भागवती शक्ति के स्थायी दिव्य स्पर्श की ओर अपनी स्वाभाविक शुद्ध भक्ति, अभीप्सा और प्रार्थना उठनें दें। भगवान योग का विशाल पथ खोल देगें । उसपर स्वयं लेकर चलेंगे । अतः योग की आंतरिक और बाह्य सभी क्रियाओं का सच्चा अनुशीलन ही वास्तविक योग है।

वर्तमान में मानव समाज में व्याप्त समस्याओं का मूल कारण है – मनुष्य का अहंकार । इसी अहं ने परमात्मा से हमारा संबंध विच्छेद कर दिया है। आत्मा के परमात्मा से टूटे हुए संबंध को पुनः स्थापित करने की विद्या का नाम है योग । योग हमारे अंदर दिव्य शरीर में दिव्य सौंदर्य, मन में दिव्य ज्ञान, प्राण में दिव्य ऊर्जा तथा हृदय में भागवत प्रेम की अभिवृद्धि कर साधना की चरम स्थिति तक पहुँचाता है। आवश्यकता है प्रत्येक कर्म और क्रिया करते समय हम भागवती चेतना से जुड़े रहें ।

यह सत्य है कि वर्तमान में धरती पर मानव शरीर ईश्वर की सबसे सुन्दर और अद्भुत कृति है। भगवान द्वारा मानव शरीर बनाने के पीछे विराट महत्तर प्रयोजन है। जिसे उसके अंदर केवल अनंत ही सम्पन्न कर सकता है। विश्व को विकसित तथा सुन्दरतम बनाने की शक्ति, संभावना और दायित्व मानव को ईश्वर द्वारा सौंपा गया है। किंतु मानव को यह स्वीकार करना होगा कि उसका यह मिट्टी का शरीर भी भगवान है। मन भी भगवान है। अध्यात्म सत्ता भी भगवान है। उसे अपनी समग्र सत्ता में भगवान को जगाना होगा। ताकि हमारे जीवन में दिव्य भगवान लहलहा उठे। जीवन और जगत् दोनों में भगवान को देखना और अभिव्यक्त करना होगा । हमारी सभी जीवन-धाराओं में भगवान लबालब भर जाये। इस चिंतन से ही मानव के अंदर उसका नूतन जन्म होगा।

   वास्तव में योगसाधना की प्रत्येक क्रिया वह आंतरिक हो या बाह्य। सभी शरीर में रहकर ही करनी हैं। शरीर के बिना योग संभव नहीं। ‘शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्’। शरीर धर्म का साधन है। यह शरीर की महिमा का सशक्त संदेश है। योगेश्वर श्रीकृष्ण का अर्जुन को यह संदेश –

ईश्वरः सर्वभूतानां ह्द्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

 ब्रह्मायन्सर्वभूतानि यन्त्ररूढ़ानि मयाया।। 18।61

हे अर्जुन ! भगवान सब प्राणियों के ह्दय में विराजमान है। और उन्हें अपनी माया से इस प्रकार घुमाते हैं मानो, वे किसी यंत्र पर आरूढ़ हों।

प्रत्येक मानव में आंतरिक भावों, मन में विचारों का युद्ध छिड़ा रहता हैं। किंतु योगमार्ग पर आकर उसे जीने की सही कला का ज्ञान सहज अंदर से होता है। भावनात्मक और मानसिक शक्ति जाग्रत होती है। प्राणिक शक्ति का विकास होता है। जीवन विकास हेतु शरीर की उपयोगिता के प्रति ज्ञान होता है। वह दृढ़ निश्चय करता है कि यु़द्ध चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, मैं इसे जीतकर ही रहूंगा । और वह भगवान से प्रार्थना करके ह्दय से इस विश्वास का संबध स्थापित कर लेता है- वे मेरे एकमात्र संरक्षक है। मुझे इस युद्ध से अवश्य मुक्ति दिलायेंगे। एकमात्र आंतरिक उपाय यही है कि सब दूषित विचारों को दूर फेंककर दृढ़ संकल्प और सक्रिय साहस के साथ योगमार्ग पर बढ़ा जाये।

   वास्तव में शरीर की अवहेलना कर उसे नष्ट कर देना या आत्महत्या करना मानव की सबसे बड़ी भूल है। मन की यह निरर्थक सोच कि आत्महत्या उसे सभी कठिनाईयों से मुक्ति दिला देगी। यह पूर्णतया असत्य है। ऐसा करने से वह मरने के बाद अपनी शोचनीय, चितांग्रस्त मानसिकता के कारण अपनी सारी कठिनाईयों के साथ और भी अधिक बुरी अवस्था में पहुँच जायेगा तथा पृथ्वी पर दूसरा जन्म होने पर उन्हीं संस्कारों के साथ पुनः जन्म धारण कर आयेगा। अतः मानव शरीर जीवन और साधना के विकास का आधार है और उसे अच्छी अवस्था में रखना ही चाहिये। उसके प्रति आसक्ति, अभिमान, घृणा या उपेक्षा का भाव नहीं होना चाहिये। उसकी प्रत्येक क्रिया में दिव्यता होनी चाहिये। उदाहरण के लिये इसे हम ऐेसे समझ सकते हैं। शरीर को आहार, क्षुद्रवासना और लालसा की तृप्ति से न दें। बल्कि योगी की तरह शरीर को बनाये रखने के लिये भोजन मौन, शांतचित्त, सचेतनता, सच्ची भावना तथा आत्मतृप्ति पूर्वक इस प्रार्थना के साथ ग्रहण करना चाहिये कि यह भोजन तुच्छ मानवीय अहं के लिये नहीं, बल्कि अपने अंदर बसने वाली दिव्य चेतना के लिये नैवेद्य हो।

    सबसे निरापद मार्ग यही है कि योग की प्रत्येक क्रिया – चाहे वह शारीरिक हो या प्राणिक या मानसिक । एक योग के सच्चे अभ्यासी को अपने अंदर चेतना के उच्चतम मार्ग में रहने का अभ्यास करना चाहिये। इस सचेतन अभ्यास के द्वारा ही वह अपनी अज्ञान और अंहकारमयी निम्नतर प्रकृति की क्रियाओं पर दबाव डालकर उन्हें रूपांतरित करने की शक्ति जागृत कर सकता है।

  प्रत्येक मानव के लिये अपनी आंतरिक प्रकृति को दिव्य बनाने के लिये एक ही यौगिक सत्य है, योगस्थ कुरु कर्माणि अर्थात् मानव योग में स्थित होकर कर्म करे। अपने सभी छोटे से छोटे कर्मों से लेकर बड़े कर्मों में शांत मन से भगवान को याद करता रहे। अहंभाव या आसक्ति से नहीं। इस उच्च भावना के साथ कि पूरे जगत् में प्रत्येक कर्म भगवान ही कर रहे हैं। तब उसके सभी कर्म अहंभाव से मुक्त और दिव्य होगें।

योग की पूर्णता प्राप्त करने में एक ही चीज सहायता करती है और वह है भागवत जीवन जीने के लिये अंदर से अभीप्सा युक्त पुकार या प्रार्थना एक प्रज्वलित लौ की तरह उठना चाहिये ।

निरंतर यही चाहना – हे प्रभो,  मुझे अपनी शरण में ले लो । हमें अनुभव होगा हमारी प्रकृति की सारी बाधा-विपत्तियाँ हट जायेगी । भागवत कृपा से हम अपने कुसंस्कारों, पापों को स्वयं जला डालेंगे । केवल मन का कोई भी प्रयास यह परिवर्तन नहीं ला सकता है । इसके लिए तो अंदर से चेतना को जगाना होगा । स्वयं की चेतना के परिवर्तन के लिये तैयारी करनी होगी ।

    योग संसार की आवश्यकता थी। आज भी है। और भविष्य में भी होगी। आज हम संसार में एक परिवर्तन देख रहे हैं। उनके अपने बौधिक, नैतिक और भौतिक प्रयोजन हैं। ‘योग’ हर युग में धरती पर रहा, उसी कारण यह परिवर्तन दिखाई दे रहा है। यह सुनिश्चित सत्य है कि योग को सभी ने सच्चे भाव से नहीं अपनाया। किंतु रोगों के बढ़ते आक्रमणों, मन की गिरती स्थितियों और आंतरिक अशांति ने धरती पर यौगिक क्रांति को पुनर्जीवित किया। सभी को योग की आवश्यकता महसूस हुई । आज समूचे विश्व के लोग योग के विस्मयकारी परिणाम और चमत्कारी प्रभाव से आकर्षित होकर योग सीख रहे हैं, सीखा रहे हैं और योग को चिकित्सा के रूप में भी अपना रहे हैं । किन्तु यह ‘योग-जीवन’ के प्रसार की बल्यावास्था है । किशोरावस्था के साथ धीरे- धीरे युवा होगा और अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त करेगा । योग विश्व को नर्क और गर्त की जिंदगी से बाहर निकालकर स्वर्ग का सुख, स्वास्थ्य और आत्मा का सौंदर्य प्रदान करेगा ।

सत्य तो यह है कि यौगिक क्रांति अपने मुहूर्त की प्रतीक्षा में थी और वह हुई – समुचे विश्व में। प्रभु की इच्छा दिव्य संकल्प के माध्यम बने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी। उनके निवेदन और संकेत पर पूरा विश्व यौगिक क्रियाओं से जुड़ गया और उसे जीवन में अपनाया। इस तरह भारत से योग की लहर से पूरा विश्व जीवन खिल उठा । योग की महिमामय शक्ति, स्फूर्ति, आरोग्यता, शांति और आनंद को सबने अनुभव किया और कर रहे हैं। वैसे तो यौगिक क्रांति की तरंगे धरती से कई बार उछालें मारकर संकेत दे रही थी – स्वस्थ और शांतिमय जीवन के लिये। किंतु हमें तामसिक शक्तियों ने घेर रखा था। यदि मानव समूची पृथ्वी को शांति, स्थिरता, एकता, भाई-चारे और भगवान का दिव्य धाम बनाना चाहता है।‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सिद्ध करना चाहता है तो उसे यौगिक क्रांति से भी आगे की आध्यात्मिक क्रांति को लाने की तैयारी करनी होगी । यही आध्यात्मिक क्रांति ही भारत को विश्व गुरू बनाने में नींव का पत्थर साबित होगी। चाहे मानव धरती पर कितने भी उपाय से कितनी भी क्रांतियाँ क्यों न कर डाले। आध्यात्मिक क्रांति ही एकमात्र ऐसी क्रान्ति होगी जो विश्व मानव के जीवन निर्माण के अगले चक्र को निर्धारित करेगी। पृथ्वी पर आध्यात्मिक क्रान्ति ही आध्यात्मिक युग को लायेगी और मनुष्य अपने अंदर के देवत्व प्राप्ति की तपस्या करेगा। अपने अंदर देवत्व को जाग्रत करके ही उसका जीवन दिव्य बनेगा और शरीर भी। तब दिव्य शरीर में दिव्य जीवन एक प्रकाशमान हीरे की तरह चमकेगा। वह मानव धरती पर उदाहरण होगा जो अपने शरीर और जीवन को योग से दिव्य बना लेगा।

    जिस प्रकार पृथ्वी के अंदर एक उत्तम किस्म का बीज उत्तम पौधे या वृक्ष को उत्पन्न करने की शक्ति अपने अंदर समाहित किये रहता है, वैसे ही दिव्य मानवीय बीज प्रस्फुटित होकर एक विश्वव्यापी दिव्य मानव समाज की संरचना कर सकता है। और समूची धरती के जीवन को दिव्य बना सकता है। यही योग का पूर्ण उद्देश्य है।

    आज अधिकांशतः विश्व के लीग योग कर रहें हैं । यदि सारे विश्व के मानव श्रीमाँ की एक सुन्दर-सी यौगिक प्रार्थना नित्य करे-

हे परम प्रभो, इस शरीर पर अधिकार करलो। अपने आपको इसमें अभिव्यक्त करो।

सत्य रूप में भगवान मानव के अंदर उतरकर उसके शरीर को अपना यंत्र बना लें। अपने-आपको उसके अंदर प्रकट करें । इससे सुन्दर और दिव्य क्या हो सकता है।

   योगी जीवन के लिये मानव के अंदर नित्य नया उत्साह, समय पर कार्य को  पूर्णता से करने की इच्छा, आंतरिक ज्ञान के प्रति सचेतनता और अंतरस्थ गुरु/भगवान की आवाज पर कर्म करने की इच्छा और आदत उसे मृत्युंजयी/अमर  बना देगी। काल उसे छू भी नहीं पायेगा।

योग को व्यापार का बाजार नहीं बनाना है l

 योग को जीवन और चेतना का आधार बनाना है ।

योग द्वारा मानव अपने अंदर की अपरिमित शक्तियों के बारे में भिज्ञ होता है । योग के द्वारा उन्हें जाग्रत कर मानव से दिव्य मानव बन सकता है ।

आलेख
सुश्री सुमन कोचर