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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.
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आसन का साधारण अर्थ है – बैठक या बैठने का सहज, स्वाभाविक तरीका।
आसन का अर्थ है – सहज शारीरिक स्थिति । हम शरीर और मन को एकाग्र कर शांत, स्थिर एवं सुखद स्थिति में रह सके ।
महर्षि पातंजलि ने ‘योग सूत्र’ में “स्थिर सुखं आसनम् l”
अर्थात् शरीर और मन को स्थिर कर सुखद और आराम की स्थिति में स्थित होकर, जो शारीरिक अभ्यास किया जाता है वह आसन होता है ।
योग की स्थिति में स्थित होकर आसन का अभ्यास करना l शुद्ध वातावरण में, शुद्ध आसन पर बैठकर, शरीर और मन को शांत, नीरव, सुखद स्थिति में रखते हुए सहज श्वास – प्रश्वास के साथ जो शारीरिक क्रियाएं की जाती है वह आसन है ।
आसन का सही अभ्यास शरीर के अंगों को शुद्ध, स्वस्थ, सुगठित, सुन्दर, नाड़ियों को सक्रिय, कोशिकाओं को तेजोमय और कांतिमय में बनाता है ।
ऐतिहासिक एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार योग विद्या के सृजनकर्ता भगवान शिव है । भगवान शिव नें आसनों की रचना की और सर्वप्रथम इन आसनों का विस्तारित ज्ञान शक्ति रूपा पार्वती को दिया । उच्च शास्त्रों के अनुसार जीव को विकास हेतु चौरासी लाख योनियों से गुजरना होता है । अतः यह आसन संख्या में चौरासी लाख योनियों के प्रतीक रूप हैं ।
ये आसन प्राणी मात्र को स्वास्थ्य, शुद्धि, विकास, आंतरिक-बाह्य परिवर्तन, मुक्ति, तथा उच्च चेतना की ओर आरोहण करने की शक्ति अपने अंदर समाहित किये हुए हैं । प्रत्येक सही योगाभ्यास करके इसका जीवंत अनुभव प्राप्त सकता है ।
सृष्टि विकास के साथ-साथ आसनों के रूप, प्रकार में परिवर्तन और सुधार होता गया । वर्तमान में मुख्य रूप से चौरासी विशिष्ट आसनों के अभ्यास को योग में स्थान दिया जा रहा है ।
योगासनों के प्रथम व्याख्याकार विद्वान, सन्त, सिद्धयोगी, आध्यात्मिक पुरुष, गोरखनाथजी (गोरक्षनाथ) थे । इन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है । कथन है कि गोरक्षनाथजी ने शिव की चेतना शक्ति को योगबल से अपने अंदर अवतरित करा लिया था । उन्होंने योग साधना द्वारा शरीर और मन को संयुक्तकर नित नये प्रयोग कर अनेक नवीन, दुर्लभ आसनों की रचना की ।
मानव सत्ता के अंगों – शरीर, प्राण, मन और चेतना के विकास में आसनों की उपयोगिता का विशिष्ट स्थान है । निश्चित ही हम आसन शरीर से करते हैं, किंतु आसनों में प्राण (श्वास-प्रश्वास) की, मन की शांत-पवित्र स्थिति, एकाग्रता के साथ, जिस उच्च चेतना में स्थिर और स्थित होकर आसन करते हैं, उसका विशेष अर्थ, महत्व और सक्रिय प्रभाव होता है ।
उच्च चेतना में आसनों का नियमित अभ्यास हमारी सत्ता के अंगों – शरीर, प्राण, और मन के दिव्य रूपांतरण और दिव्यीकरण में सहायक होकर हमें उच्चतर और उच्चतम आंतरिक – बाह्य अभ्यास के साथ आत्म-साक्षात्कार की तैयारी में सहायक सिद्ध हो सकता है । जो कि इन योग-साधनाओं की क्रियाओं के पीछे हमारे ऋषियों, संतों और सिद्ध योगियों की भावना और लक्ष्य रहा है ।
