दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands. You just go to and do your best.

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कवितायेँ

मिट्टी की देह में

केवलदेवत्वको जाग्रत् करने हेतु

उस परम् ने परम का अंश-बीज बोया है।

अपनी रहस्यमयी लीला की संसिद्धि-हेतु

असंख्यों युगों से,मिट्टी की इस देह में

परम का यह जादू-भरा खेल

इसीलिए है खेला जा रहा है।

कि खेल-खेल में सहसा

मानव अनचले मार्गों को खोज ले।

कि खेल-खेल में

अश्रुत वाणियों को सुन सके।

कि खेल-खेल में

अदृश्य दृश्यों को देख ले।

कि खेल-खेल में

अस्पृश्य तत्त्वों का स्पर्श कर ले।

कि खेल-खेल में

अनछुई गहराइयों को छू ले।

जब तक मानव मन के कठोर पूर्वाग्रही विचारों

की तहें टूट न जातीं या

मानव मन के निम्न प्राण की क्षुद्र इच्छाएँ

भस्मीभूत होने ऊपर फूट न आती

तब तक कैसे हो सकती है यह सत्ता शान्त और नीरव?

शान्ति तथा नीरवता के पार्श्व में ही तो

छुपा हुआ है दिव्य गन्ध का यह सुमन

इसी सुमनके उर्वर जागरण-हेतु ही तो

युगों से मानव की अभंग अभीप्सा का

प्रयत्न धरती पर है चल रहा।

जिसके अरुणिम स्वर्णिम प्रकाश में,

उस परम को वह (मानव) है अभिव्यक्त कर रहा ।

मानव में भगवान् की अभिव्यक्ति कोई खेल नहीं है ।

जो हर क्षण शिशु बन कर परम प्रभु के साथ खेल खेल सकते हैं,

वे ही अपने अन्दर परम प्रभु की अभिव्यक्ति के

खेल में विजयी हो सकते हैं।

-डॉ. सुमन कोचर

भागवत योजना

संक्रमण के दौर से गुजर रही धरती ,

जीर्ण , पुराने और नये का चल रहा युद्ध ।

पुराना अड़ा हुआ अपनी जिद पर,

नया चुपके से आ धमका पृथ्वी जीवन पर ।

यूं मानो भविष्य सीधा ही बिना दस्तक दिये,

वर्तमान में दबे पाँव घुस आया ।

नई दुनिया जन्म ले चुकी धरती पर,

किन्तु मानव है अभी बहुत ही दुर्बल ।

उसे नये तौर – तरीके मान्य नहीं ,

पुराने भी उसके किसी काम के नहीं ।

किंतु नया अन्दर है,

अन्दर पनपने का कर रहा प्रयास,

उसने स्वयं नई राह खोली और रच दिया इतिहास ।

जिस पर कभी नहीं पड़े थे मानव के पग

लगता है घोर संकट पर पड़ गये विजय के डग

महाविजय तो अभी आना शेष है,

उसके लिए तो एक बड़ा युद्ध लड़ना होगा ।

बड़ा झटका सहने को तैयार होना होगा ।

महाविजय या महाविनाश की क्या औकात ?

जब है परम प्रभु तेरे साथ और जब तू है प्रभु के हाथ ।

यह तो है एक सुनियोजित भागवत योजना का अंग ,

अंतरात्मा को तेरी सत्ता का सच्चा नेतृत्व देने का अपना ढंग ।

घनघोर अंधकार में खोल अपनी अंतः दृष्टि,

भगवान है तेरी नींव, भगवान ही मंजिल और सृष्टि ।

रचना
डॉ. सुमन कोचर

युवा कौन है , समस्या और निदान

युवा कौन है ?

युवा वह है जो जानता है

वह कौन है , क्यों है , क्या है ?

क्या कमी है , क्या पाना है , उसे क्या होना है ?

युवा वह है – जिसमें भविष्य में जीने की इच्छा शक्ति होसदैव सब कुछ पीछे छोड़ने – त्यागने की भक्ति हो ।

जो किसी भी चीज़ को असाध्य न मानता होजो अध्यवसायी और आत्म बलिदानी हो

युवा वह है – जो प्रतिक्षण सचेतन और जागरूक होजो स्वभाव से शांत , स्थिर और मन से नीरव हो

जिसमें एकाग्रता , सच्चाई और आंतरिक गहराई होजो न हो कामनाओं , वासनाओं , इच्छाओं का गुलाम

जो व्यक्तिगत स्वार्थ से हो मुक्त और उत्तेजना को मानता है हराम ।युवा वह है – जो अपरिवर्तनीय संकल्प का स्वामी हो

जो निष्कपट , उदार और ईमानदार होजिसके जीवन का लक्ष्य दिव्य और भगवान हो

जिसके अन्दर प्रगति की अतोषणीय प्यास होयुवा वह है – प्रगति के रहस्यमय यौवन को जानता हो

जिसे प्रगति की असीम संभावना और भागवत शक्ति का ज्ञान हो ।युवा वह है – जो खोजी , उत्साही और प्रतिभावान हो

जो सहनशील , मेहनती , उच्चाकांक्षी और जिसमें देश का स्वाभिमान हो ।

जो निर्भीक , कठोर परिश्रमी ,साहसी , बलशाली और चरित्रवान हो ,

जिसे एकता का भान हो, छू न गया कोई अभिमान हो ।युवा वह है – जो सत्यनिष्ठ , आज्ञाकारी और धैर्यवान हो ,

जो विनयशील और प्रज्ञावान हो ।जो सत्य संकल्पी और अंतर प्रगति का अभीप्सु हो

नित नयी प्रगति को उत्सुक और अभ्यासी होजो स्वयं की प्रकृति के रूपांतर के लिए जिज्ञासु हो

जो भगवत्ता के प्रति अन्दर से खुला और विश्वासी होसत्य शक्ति का पूर्ण यंत्र बनने का अभिलाषी हो ।

युवा वह है – जो श्रद्धा, विश्ववास, त्याग और समर्पण की मिसाल हो

जिसे अंतः शक्ति की पहचान होजो आत्मा का करता सदैव सम्मान होजो दिव्य गुणों की खान हो

जिसे जीवन की पूर्णता को पाने का भान हो और पूर्णत्व का ध्यान हो ।

जो सदैव उत्सर्गवान और भगवान के प्रति निष्ठावान हो ।

युवा वह है – जिसका लक्ष्य अपने और जगत का नव – निर्माण हो ।

सार रूप में युवा वह है जो सत्यवान हो,जिसे हर विद्या का अक्षय ज्ञान हो

दिव्य प्रेम, भक्ति , एकता और आनंद की संतान हो ।

समस्या क्या है ?

समस्या है जल्दबाजी में रहना , प्रगति से थक जाना ।

आराम की चाहना , आलस्य को पोसना ।

रूपांतर से डरना, दिव्यत्व से ऊबना ।

क्रोध में बह जाना , उत्तेजनाओं में खो जाना ।

नशे में धुत हो , अपने को भूल जाना ।

अज्ञान और‘अहं’ में ‘अँधा’ हो

‘स्व’ ‘स्व’ और ‘स्व’ को ही देखना ।

निदान है –

आंतरिक विकास के प्रति सचेतन होना ।

निम्न कामनाओं पर विजय द्वारा अपने‘स्व को जानना

अपने ‘अहं’ को स्वयं पराजित करना ।

अपने ‘अहं’ की पराजय का स्वयं आनंद लेना ।

सत्ता के अंगों और चेतना के विकास को दिव्य लक्ष्य मानना ।

निदान है – आत्म संयम से व्यक्तित्व को बुनना,

दिव्य जीवन हेतु भगवान को चुनना ।

अपने आपको भगवान की ओर खोलना,

अपना सब कुछ भगवान को दे देना ।

  • आत्म विजय हेतु उड़ना होगी एक आंतरिक एवं साहसिक उड़ान,जानना होगा उच्चतम लक्ष्य की ओर निरंतर आरोहण करने का दिव्य विज्ञान ।यही है युवकों की समस्या का सही निदान ।जैसा सावित्री और सत्यवान ने कर दिखाया था ।
  • ‘स्व-रूपांतरण’ और ‘प्रेम’ निदान की है एक ही कुंजीइस कुंजी से उच्चतम संभावनाओं के सभी द्वार है स्वतः खुल जाते ।तब हममें से ही हर एक में भगवान खिलकर हैं बाहर आ जाते ।
  • यही है जीवन का एकमात्र परम लक्ष्य और शाश्वत यौवन का रहस्य !जिसे करना होगा प्रत्येक युवा को अभिव्यक्त ।
-डॉ. सुमन कोचर

सच्चे पेड़-पौधे

जब हम मौन भाव-भंगियों में डूबकर,

इन्हें अपना प्रेमिल स्पर्श दे रहे होते हैं,

तब ये नाचते झूमते,मुस्कुराते

हमसे बातें कर रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम इनके समीप जा,

मधुर स्वर में गुन-गुना रहे होते हैं,

तब ये झूमती मौन अदाओं से

हमें सराबोर कर रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम दौड़ा-धूपी में होते हैं,

तब ये अपनी शाखाएँ नचाकर,

झूम-झूमकर लहरा – लहराकर,

जैसे हँस रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

गर्मी की लू के झोंकों को,

आंधी-वर्षा के थपेड़ों को,

ठण्ड की ठिठुरन को,

ये कैसे सह रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

सारा वैभव देकर भी हम,

कैसे इन्हें खरीद सकते हैं

अर्पित करें यदि हम सारा जीवन,

ये मन – मोहक साक्षी हो सकते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम शांत और नीरव होकर , इनके निकट जाते है ,

सुप्त प्राण को ऊर्जा से भर देते हैं

मन की ग्रंथियों को तोड़कर , ह्रदय में उतर आते हैं

आत्म विभोर कर , जीवन अमृत भर देते हैं

कितने सुन्दर ! कितने सच्चे पेड़-पौधे होते हैं

-डॉ. सुमन कोचर

रोग – योग

दबे पाँव आया विश्व में

रोग तो योग की सुनियोजित दस्तक है ,

घोर तमावृत रात्रि रोग, मृत्यु का भीषण तांडव ।

नर्क से हालात , चारों ओर झकझोरने वाला

अंतर भय और मरुस्थल जैसा जीवन,

सारा धन, वैभव रखकर तलाश थी एक जीवन की ।

शतायु , दीर्घायु जीवन लघु बन गया ।

जीर्ण मूल्य एक क्षण में पराजित हो गये,

टूटने लगी सारी रूढ़ियाँ – परम्पराएँ ।

खण्ड – खण्ड होने लगे आदर्श, धूल बनती गयी रूढ़ नीतियाँ ।

नीरस जीवन वीरान क्षण – क्षण,

अवरुद्ध मार्ग से मानव स्तब्ध हो गया !

तभी समूचे विश्व से सामूहिक प्रार्थना के स्वर हुए एक साथ मुखरित –

हे प्रभो ! रक्षा कर ! रक्षा कर ! रक्षा कर !

अब एकमात्र तू ही सहारा है ।

प्रकृति और धरती का सामीप्य पाने और उसपर अभी और रहने को तड़प उठा

मानव ।

विजय का उद्घोष करती नयी रहनि – गहनि ने

धरती पर जमाया डेरा

नए युग की नयी चाल

समूचे विश्व को नचा गयी

आमूल रूपान्तरण या रसातल

एक को चुनना होगा

सहमा मानव । बाहर एक ओर था विकराल बवंडर

अन्दर था अहंकार , अज्ञान , अंधकार पूरी कमर तोड़ने को तैयार ।

अदृश्य शक्ति ने अन्दर से हुंकार भरी –

हे बुद्धिशील मानव ! अब तो जाग । तू मेरी संतान है

चेतना का ज्ञान प्राप्त कर, ध्यानस्थ हो जा ।

अपने अन्दर चैत्य की गहराई में उतर

सत्य चेतना को पा और कर अभीप्सा

अपनी प्रकृति के शांत और स्थिर होने की ।

साथ ही रूपान्तरण और दिव्यीकरण की ।

तत्क्षण चेतना के विकास मंत्र अन्दर से गुंजरित होने लगे ,

घने काले बादल छंटने लगे,

थरथराते मानव जीवन में एक संकल्प लहर दौड़ गई

सुख की रोटी खाना है तो बंद कर ये भाग – दौड़ ।

अपने घर और अपने देश में कर पुनर्गमन

जहाँ प्रभु ने तुझे जन्म दिया है ।

उसी में दिव्य जीवन जीना और रचना है ।

उसी के लिए मरना और मिटना है ।

नई भावी सृष्टि के स्वागत का मंगलाचरण गाना है

नई भोर हुई –

मैं उठी । मैंने योग और ध्यान किया ।

मैंने देखा सृष्टि में कहीं रोग नहीं, योग ही योग था !

मैंने दर्शन किया यह मेरी आत्मा का प्रभु संग ‘योग’ था !

-डॉ. सुमन कोचर

धरती का सूत्रधार

ओ अंतहीन अंधेरे

तू हट जा परे ।

होने नव सूर्योदय,

रोग कर रहा वार पर वार ।

असमय मृत्यु का रुदन,

धरती बन गई, एक सुलगता शोला ।

टूट रहा अपनों से नाता ,

लग रहा दुखों का तांता ,

देख प्रतिक्षण हो रहा जीवन क्षय ,

दीन – हीन बन गया मानव ।

शत्रु दिखता नहीं है सामने ,

किंतु व्याप्त है चहुँ ओर उसी का भय ।

सब ओर घुटी – घुटी आहें – कराहें ।

पलक झपकते ही बन रहे

सब क्रूर काल के ग्रास

कबसे झेल रहें हैं

काल के घात – प्रतिघात ।

प्रेम की प्यासी धरती पर

नव जीवन सूर्य उगे , नूतन राह बनें

नए पथ पर, नए ढंग से

फिर दौड़े धरती पर नव जीवन रथ ।

रोग , शोक , मृत्यु – तांडव के आगे

महल , धन, ऐश्वर्य , बुद्धि , चातुर्य सब है लाचार

यह बवंडर तभी शांत होगा

जब अवतरित होगा धरती का दिव्य प्रेमी सूत्रधार ।

-डॉ. सुमन कोचर

स्वर्णिम जहाज

मैंने कई तूफ़ान देखे

कई तूफ़ान सहे भी

कई तूफानों से लड़ी भी हूँ

कौन था वह ? जो तूफानों में, मुझे अपनी बाहों में सुरक्षित किए हुए ?

अब मैं तूफानों को सह सकती हूँ

भागवत बल का सम्बल लेकर

योद्धा की तरह तूफानों से लड़ भी सकती हूँ

तूफानों में शांत – अविचलित भी रह सकती हूँ

विश्वास है मेरे चारों ओर वह है प्रत्यक्ष ।

मेरे सभी युद्ध वही लड़ और सह रहा है मेरे अन्दर ।

उसने मुझे सब कुछ दिया , और दिया अनन्य दिव्य प्रेम

उपहार में दिया दृढ श्रद्धा और अटूट विश्वास

उसका कर्म करना है मेरे जीवन का दिव्य लक्ष्य ।

बस उसका यंत्र बन जाये मेरी देह ,

न रहे जीवन में अन्य कोई ध्येय ।

मैंने चिंतन किया वही तो है सभी के अंदर

बशर्ते कि मेरा ‘मैं’ हो जाए बाहर

मैं मात्र हूँ एक यंत्र और वह है दिव्य यंत्री

जैसे वह घूमाता है, मैं घूमती हूँ

उसके दिव्य संकल्प है मेरी गति के मार्गदर्शक

जीवन के पूर्ण संरक्षक ।

मुझे दिया गया है बल लड़ने का तूफ़ान से

अंदर दंभ टूट जाये झूठे अभिमान का

मन में विचार कौंधा स्वाभिमान का

मैंने पढ़ा पाठ सांसारिक अज्ञान और सत्य ज्ञान का

आत्मा से मंत्र उठा दिव्य ज्ञान का ।

अब मैं स्वर्णिम जहाज में बैठी,

विहर रही हूँ तेरे संग

अनायास तूने अपनी विशाल भुजाएँ फैलाई

और ले लिया ‘विश्व’ को अपने आलिंगन में !

स्वर्णिम प्रभु का स्वर्णिम जहाज चलता देख

हर एक यात्री मोहित हो, उसमें बेठने को था लालायित

‘तू’ भी खींचने लगा, सबको पकड़-पकड़ कर

डालने लगा स्वर्णिम जहाज की प्रशांत नीरवता में,

सभी यात्री निःशब्द और ध्यानस्थ हो गये,

सबके अंतर ह्रदय परम सुख से भर गये ।

स्वर्ण देव सम हो गये !

स्वर्णिम जहाज में होने लगा शब्दहीन दिव्य नाद और दर्शन ,

अब मैं गरजते तूफ़ान में भी जहाज चला सकती हूँ ,

क्योंकि मेरा जहाज है स्वर्णिम और प्रभुमय !

क्योंकि उसे चला रहे हैं स्वयं, स्वर्ण कमल प्रभु !

-डॉ. सुमन कोचर

मिट्टी की देह में

केवलदेवत्वको जाग्रत् करने हेतु

उस परम् ने परम का अंश-बीज बोया है।

अपनी रहस्यमयी लीला की संसिद्धि-हेतु

असंख्यों युगों से,मिट्टी की इस देह में

परम का यह जादू-भरा खेल

इसीलिए है खेला जा रहा है।

कि खेल-खेल में सहसा

मानव अनचले मार्गों को खोज ले।

कि खेल-खेल में

अश्रुत वाणियों को सुन सके।

कि खेल-खेल में

अदृश्य दृश्यों को देख ले।

कि खेल-खेल में

अस्पृश्य तत्त्वों का स्पर्श कर ले।

कि खेल-खेल में

अनछुई गहराइयों को छू ले।

जब तक मानव मन के कठोर पूर्वाग्रही विचारों

की तहें टूट न जातीं या

मानव मन के निम्न प्राण की क्षुद्र इच्छाएँ

भस्मीभूत होने ऊपर फूट न आती

तब तक कैसे हो सकती है यह सत्ता शान्त और नीरव?

शान्ति तथा नीरवता के पार्श्व में ही तो

छुपा हुआ है दिव्य गन्ध का यह सुमन

इसी सुमनके उर्वर जागरण-हेतु ही तो

युगों से मानव की अभंग अभीप्सा का

प्रयत्न धरती पर है चल रहा।

जिसके अरुणिम स्वर्णिम प्रकाश में,

उस परम को वह (मानव) है अभिव्यक्त कर रहा ।

मानव में भगवान् की अभिव्यक्ति कोई खेल नहीं है ।

जो हर क्षण शिशु बन कर परम प्रभु के साथ खेल खेल सकते हैं,

वे ही अपने अन्दर परम प्रभु की अभिव्यक्ति के

खेल में विजयी हो सकते हैं।

-डॉ. सुमन कोचर
प्रकाशित: अग्निशिखा, जनवरी २०१९

भागवत योजना

संक्रमण के दौर से गुजर रही धरती,

जीर्ण , पुराने और नये का चल रहा युद्ध ।

पुराना अड़ा हुआ अपनी जिद पर,

नया चुपके से आ धमका पृथ्वी जीवन पर ।

यूं मानो भविष्य सीधा ही बिना दस्तक दिये,

वर्तमान में दबे पाँव घुस आया ।

नई दुनिया जन्म ले चुकी धरती पर,

किन्तु मानव है अभी बहुत ही दुर्बल ।

उसे नये तौर – तरीके मान्य नहीं,

पुराने भी उसके किसी काम के नहीं ।

किंतु नया अन्दर है,

अन्दर पनपने का कर रहा प्रयास,

उसने स्वयं नई राह खोली और रच दिया इतिहास ।

जिस पर कभी नहीं पड़े थे मानव के पग

लगता है घोर संकट पर पड़ गये विजय के डग

महाविजय तो अभी आना शेष है,

उसके लिए तो एक बड़ा युद्ध लड़ना होगा ।

बड़ा झटका सहने को तैयार होना होगा ।

महाविजय या महाविनाश की क्या औकात ?

जब है परम प्रभु तेरे साथ और जब तू है प्रभु के हाथ ।

यह तो है एक सुनियोजित भागवत योजना का अंग ,

अंतरात्मा को तेरी सत्ता का सच्चा नेतृत्व देने का अपना ढंग ।

घनघोर अंधकार में खोल अपनी अंतः दृष्टि,

भगवान है तेरी नींव, भगवान ही मंजिल और सृष्टि ।

रचना
डॉ. सुमन कोचर

युवा कौन है , समस्या और निदान

युवा कौन है ?

युवा वह है जो जानता है

वह कौन है , क्यों है , क्या है ?

क्या कमी है , क्या पाना है , उसे क्या होना है ?

युवा वह है – जिसमें भविष्य में जीने की इच्छा शक्ति होसदैव सब कुछ पीछे छोड़ने – त्यागने की भक्ति हो ।

जो किसी भी चीज़ को असाध्य न मानता होजो अध्यवसायी और आत्म बलिदानी हो

युवा वह है – जो प्रतिक्षण सचेतन और जागरूक होजो स्वभाव से शांत , स्थिर और मन से नीरव हो

जिसमें एकाग्रता , सच्चाई और आंतरिक गहराई होजो न हो कामनाओं , वासनाओं , इच्छाओं का गुलाम

जो व्यक्तिगत स्वार्थ से हो मुक्त और उत्तेजना को मानता है हराम ।युवा वह है – जो अपरिवर्तनीय संकल्प का स्वामी हो

जो निष्कपट , उदार और ईमानदार होजिसके जीवन का लक्ष्य दिव्य और भगवान हो

जिसके अन्दर प्रगति की अतोषणीय प्यास होयुवा वह है – प्रगति के रहस्यमय यौवन को जानता हो

जिसे प्रगति की असीम संभावना और भागवत शक्ति का ज्ञान हो ।युवा वह है – जो खोजी , उत्साही और प्रतिभावान हो

जो सहनशील , मेहनती , उच्चाकांक्षी और जिसमें देश का स्वाभिमान हो ।

जो निर्भीक , कठोर परिश्रमी ,साहसी , बलशाली और चरित्रवान हो ,

जिसे एकता का भान हो, छू न गया कोई अभिमान हो ।युवा वह है – जो सत्यनिष्ठ , आज्ञाकारी और धैर्यवान हो ,

जो विनयशील और प्रज्ञावान हो ।जो सत्य संकल्पी और अंतर प्रगति का अभीप्सु हो

नित नयी प्रगति को उत्सुक और अभ्यासी होजो स्वयं की प्रकृति के रूपांतर के लिए जिज्ञासु हो

जो भगवत्ता के प्रति अन्दर से खुला और विश्वासी होसत्य शक्ति का पूर्ण यंत्र बनने का अभिलाषी हो ।

युवा वह है – जो श्रद्धा, विश्ववास, त्याग और समर्पण की मिसाल हो

जिसे अंतः शक्ति की पहचान होजो आत्मा का करता सदैव सम्मान होजो दिव्य गुणों की खान हो

जिसे जीवन की पूर्णता को पाने का भान हो और पूर्णत्व का ध्यान हो ।

जो सदैव उत्सर्गवान और भगवान के प्रति निष्ठावान हो ।

युवा वह है – जिसका लक्ष्य अपने और जगत का नव – निर्माण हो ।

सार रूप में युवा वह है जो सत्यवान हो,जिसे हर विद्या का अक्षय ज्ञान हो

दिव्य प्रेम, भक्ति , एकता और आनंद की संतान हो ।

समस्या क्या है ?

समस्या है जल्दबाजी में रहना , प्रगति से थक जाना ।

आराम की चाहना , आलस्य को पोसना ।

रूपांतर से डरना, दिव्यत्व से ऊबना ।

क्रोध में बह जाना , उत्तेजनाओं में खो जाना ।

नशे में धुत हो , अपने को भूल जाना ।

अज्ञान और‘अहं’ में ‘अँधा’ हो

‘स्व’ ‘स्व’ और ‘स्व’ को ही देखना ।

निदान है –

आंतरिक विकास के प्रति सचेतन होना ।

निम्न कामनाओं पर विजय द्वारा अपने‘स्व को जानना

अपने ‘अहं’ को स्वयं पराजित करना ।

अपने ‘अहं’ की पराजय का स्वयं आनंद लेना ।

सत्ता के अंगों और चेतना के विकास को दिव्य लक्ष्य मानना ।

निदान है – आत्म संयम से व्यक्तित्व को बुनना,

दिव्य जीवन हेतु भगवान को चुनना ।

अपने आपको भगवान की ओर खोलना,

अपना सब कुछ भगवान को दे देना ।

  • आत्म विजय हेतु उड़ना होगी एक आंतरिक एवं साहसिक उड़ान,जानना होगा उच्चतम लक्ष्य की ओर निरंतर आरोहण करने का दिव्य विज्ञान ।यही है युवकों की समस्या का सही निदान ।जैसा सावित्री और सत्यवान ने कर दिखाया था ।
  • ‘स्व-रूपांतरण’ और ‘प्रेम’ निदान की है एक ही कुंजीइस कुंजी से उच्चतम संभावनाओं के सभी द्वार है स्वतः खुल जाते ।तब हममें से ही हर एक में भगवान खिलकर हैं बाहर आ जाते ।
  • यही है जीवन का एकमात्र परम लक्ष्य और शाश्वत यौवन का रहस्य !जिसे करना होगा प्रत्येक युवा को अभिव्यक्त ।
रचना
डॉ. सुमन कोचर

सच्चे पेड़-पौधे

जब हम मौन भाव-भंगियों में डूबकर,

इन्हें अपना प्रेमिल स्पर्श दे रहे होते हैं,

तब ये नाचते झूमते,मुस्कुराते

हमसे बातें कर रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम इनके समीप जा,

मधुर स्वर में गुन-गुना रहे होते हैं,

तब ये झूमती मौन अदाओं से

हमें सराबोर कर रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम दौड़ा-धूपी में होते हैं,

तब ये अपनी शाखाएँ नचाकर,

झूम-झूमकर लहरा – लहराकर,

जैसे हँस रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

गर्मी की लू के झोंकों को,

आंधी-वर्षा के थपेड़ों को,

ठण्ड की ठिठुरन को,

ये कैसे सह रहे होते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

सारा वैभव देकर भी हम,

कैसे इन्हें खरीद सकते हैं

अर्पित करें यदि हम सारा जीवन,

ये मन – मोहक साक्षी हो सकते हैं ।

ये सच्चे पेड़-पौधे होते हैं ।

जब हम शांत और नीरव होकर , इनके निकट जाते है ,

सुप्त प्राण को ऊर्जा से भर देते हैं

मन की ग्रंथियों को तोड़कर , ह्रदय में उतर आते हैं

आत्म विभोर कर , जीवन अमृत भर देते हैं

कितने सुन्दर ! कितने सच्चे पेड़-पौधे होते हैं

रचना
डॉ. सुमन कोचर

रोग – योग

दबे पाँव आया विश्व में

रोग तो योग की सुनियोजित दस्तक है ,

घोर तमावृत रात्रि रोग, मृत्यु का भीषण तांडव ।

नर्क से हालात , चारों ओर झकझोरने वाला

अंतर भय और मरुस्थल जैसा जीवन,

सारा धन, वैभव रखकर तलाश थी एक जीवन की ।

शतायु , दीर्घायु जीवन लघु बन गया ।

जीर्ण मूल्य एक क्षण में पराजित हो गये,

टूटने लगी सारी रूढ़ियाँ – परम्पराएँ ।

खण्ड – खण्ड होने लगे आदर्श, धूल बनती गयी रूढ़ नीतियाँ ।

नीरस जीवन वीरान क्षण – क्षण,

अवरुद्ध मार्ग से मानव स्तब्ध हो गया !

तभी समूचे विश्व से सामूहिक प्रार्थना के स्वर हुए एक साथ मुखरित –

हे प्रभो ! रक्षा कर ! रक्षा कर ! रक्षा कर !

अब एकमात्र तू ही सहारा है ।

प्रकृति और धरती का सामीप्य पाने और उसपर अभी और रहने को तड़प उठा

मानव ।

विजय का उद्घोष करती नयी रहनि – गहनि ने

धरती पर जमाया डेरा

नए युग की नयी चाल

समूचे विश्व को नचा गयी

आमूल रूपान्तरण या रसातल

एक को चुनना होगा

सहमा मानव । बाहर एक ओर था विकराल बवंडर

अन्दर था अहंकार , अज्ञान , अंधकार पूरी कमर तोड़ने को तैयार ।

अदृश्य शक्ति ने अन्दर से हुंकार भरी –

हे बुद्धिशील मानव ! अब तो जाग । तू मेरी संतान है

चेतना का ज्ञान प्राप्त कर, ध्यानस्थ हो जा ।

अपने अन्दर चैत्य की गहराई में उतर

सत्य चेतना को पा और कर अभीप्सा

अपनी प्रकृति के शांत और स्थिर होने की ।

साथ ही रूपान्तरण और दिव्यीकरण की ।

तत्क्षण चेतना के विकास मंत्र अन्दर से गुंजरित होने लगे ,

घने काले बादल छंटने लगे,

थरथराते मानव जीवन में एक संकल्प लहर दौड़ गई

सुख की रोटी खाना है तो बंद कर ये भाग – दौड़ ।

अपने घर और अपने देश में कर पुनर्गमन

जहाँ प्रभु ने तुझे जन्म दिया है ।

उसी में दिव्य जीवन जीना और रचना है ।

उसी के लिए मरना और मिटना है ।

नई भावी सृष्टि के स्वागत का मंगलाचरण गाना है

नई भोर हुई –

मैं उठी । मैंने योग और ध्यान किया ।

मैंने देखा सृष्टि में कहीं रोग नहीं, योग ही योग था !

मैंने दर्शन किया यह मेरी आत्मा का प्रभु संग ‘योग’ था !

रचना
-डॉ. सुमन कोचर

धरती का सूत्रधार

ओ अंतहीन अंधेरे

तू हट जा परे ।

होने नव सूर्योदय,

रोग कर रहा वार पर वार ।

असमय मृत्यु का रुदन,

धरती बन गई, एक सुलगता शोला ।

टूट रहा अपनों से नाता ,

लग रहा दुखों का तांता ,

देख प्रतिक्षण हो रहा जीवन क्षय ,

दीन – हीन बन गया मानव ।

शत्रु दिखता नहीं है सामने ,

किंतु व्याप्त है चहुँ ओर उसी का भय ।

सब ओर घुटी – घुटी आहें – कराहें ।

पलक झपकते ही बन रहे

सब क्रूर काल के ग्रास

कबसे झेल रहें हैं

काल के घात – प्रतिघात ।

प्रेम की प्यासी धरती पर

नव जीवन सूर्य उगे , नूतन राह बनें

नए पथ पर, नए ढंग से

फिर दौड़े धरती पर नव जीवन रथ ।

रोग , शोक , मृत्यु – तांडव के आगे

महल , धन, ऐश्वर्य , बुद्धि , चातुर्य सब है लाचार

यह बवंडर तभी शांत होगा

जब अवतरित होगा धरती का दिव्य प्रेमी सूत्रधार ।

रचना
-डॉ. सुमन कोचर

स्वर्णिम जहाज

मैंने कई तूफ़ान देखे

कई तूफ़ान सहे भी

कई तूफानों से लड़ी भी हूँ

कौन था वह ? जो तूफानों में, मुझे अपनी बाहों में सुरक्षित किए हुए ?

अब मैं तूफानों को सह सकती हूँ

भागवत बल का सम्बल लेकर

योद्धा की तरह तूफानों से लड़ भी सकती हूँ

तूफानों में शांत – अविचलित भी रह सकती हूँ

विश्वास है मेरे चारों ओर वह है प्रत्यक्ष ।

मेरे सभी युद्ध वही लड़ और सह रहा है मेरे अन्दर ।

उसने मुझे सब कुछ दिया , और दिया अनन्य दिव्य प्रेम

उपहार में दिया दृढ श्रद्धा और अटूट विश्वास

उसका कर्म करना है मेरे जीवन का दिव्य लक्ष्य ।

बस उसका यंत्र बन जाये मेरी देह ,

न रहे जीवन में अन्य कोई ध्येय ।

मैंने चिंतन किया वही तो है सभी के अंदर

बशर्ते कि मेरा ‘मैं’ हो जाए बाहर

मैं मात्र हूँ एक यंत्र और वह है दिव्य यंत्री

जैसे वह घूमाता है, मैं घूमती हूँ

उसके दिव्य संकल्प है मेरी गति के मार्गदर्शक

जीवन के पूर्ण संरक्षक ।

मुझे दिया गया है बल लड़ने का तूफ़ान से

अंदर दंभ टूट जाये झूठे अभिमान का

मन में विचार कौंधा स्वाभिमान का

मैंने पढ़ा पाठ सांसारिक अज्ञान और सत्य ज्ञान का

आत्मा से मंत्र उठा दिव्य ज्ञान का ।

अब मैं स्वर्णिम जहाज में बैठी,

विहर रही हूँ तेरे संग

अनायास तूने अपनी विशाल भुजाएँ फैलाई

और ले लिया ‘विश्व’ को अपने आलिंगन में !

स्वर्णिम प्रभु का स्वर्णिम जहाज चलता देख

हर एक यात्री मोहित हो, उसमें बेठने को था लालायित

‘तू’ भी खींचने लगा, सबको पकड़-पकड़ कर

डालने लगा स्वर्णिम जहाज की प्रशांत नीरवता में,

सभी यात्री निःशब्द और ध्यानस्थ हो गये,

सबके अंतर ह्रदय परम सुख से भर गये ।

स्वर्ण देव सम हो गये !

स्वर्णिम जहाज में होने लगा शब्दहीन दिव्य नाद और दर्शन ,

अब मैं गरजते तूफ़ान में भी जहाज चला सकती हूँ ,

क्योंकि मेरा जहाज है स्वर्णिम और प्रभुमय !

क्योंकि उसे चला रहे हैं स्वयं, स्वर्ण कमल प्रभु !

रचना
-डॉ. सुमन कोचर