दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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श्री माँ की प्रार्थनाएँ

कुछ लोग प्रभु को प्रदान करते हैं अपना अंतर आत्मा,

कुछ लोग देते हैं उन्हें अपना जीवन,

और कुछ निवेदित करते हैं उन्हें अपने कर्म और धन,

बहुत कम है वे जन,

जो प्रभु को अर्पित करते हैं अपना सर्वस्व, समर्पण

अपना अंतरात्मा, अपना जीवन, कर्म और धन।

वे ही हैं प्रभु के सच्चे बालक !

अन्य कुछ लोग हैं जो उन्हें कुछ नहीं देते,

उनकी चाहे जो हो पद-प्रतिष्ठा

धन वैभव और अधिकार,

प्रभु की सृष्टि में

उनके प्रयोजन की दृष्टि में

वे हैं मात्र एक मूल्यहीन शून्य के समान !

यह प्रार्थना है उन लोगों के लिए

जो प्रभु की अभीप्सा करते हैं

तथा जिनमें निहित है सर्वस्व समर्पण की अभिलाषा

1941 - 48
श्री माँ

राधा की प्रार्थना

माँ ने मूल रूप से यह कविता पहले अंग्रेज़ी में लिखी थी, फिर अगले दिन फ्रेंच में इसका अनुवाद किया। बाद में श्रीअरविन्द ने फ्रेंच का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा किया गया उसका हिन्दी अनुवाद ।

प्रथम दृष्टि में ही जिसको पहचान गया अभ्यन्तर

अपना स्वामी , जीवन का सर्वस्व , ह्रदय का ईश्वर ;

हे मेरे प्रभु , तू मेरी श्रद्धाञ्जलि स्वीकृत कर ! —-

तेरे ही हैं मेरे निखिल विचार , भावना, चिंतन ,

मेरे उर-आवेग , ह्रदय-संकल्प , सकल संवेदन ;

तेरे ही हैं मेरे जीवन के व्यापार प्रतिक्षण ,

मेरे तन का एक-एक अणु , शोणित का प्रति कण–कण !

सर्व भाँति , सम्पूर्ण रूप से तेरी हूँ मैं निश्चय ,

प्रिय , सर्वथा अशेष रूप से तेरी ही नि:संशय ;

तेरी इच्छा से परिचालित होगा मेरा जीवन ,

केवल तेरी ही विधि का मैं, नाथ, करूँगी पालन !

जीवन – मरण कि हर्ष-शोक भेजे तू या सुख – दु:ख के क्षण ,

तेरे वरदानों का नित्य करेगा उर अभिवादन ;

दिव्य देन होगी तेरी प्रत्येक देन मेरे हित ,

वह सदैव प्रभु , परम हर्ष की वाहक होगी निश्चित !

श्री मां ; १३ जनवरी १९३२
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