दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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गर्भाधान पूर्व शिक्षा

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गर्भाधान पूर्व शिक्षा और साधना के लिये आवश्यक है कि हम यह जाने कि विवाह का उद्देश्य क्या हैं ?

श्रीमां कहती है – पति और पत्नि को अपने शारीरिक अस्तित्वों, अपनी भौतिक रुचियों में एक होना, सभी कठिनाईयों – सफलताओं का एक साथ सामना करने के लिये तैयार हो जाना विवाह का आधार है। मन के विचारों भावों, रुचियों, प्रेम में एक होना, हमेशा हर परिस्थिति में आराम, शान्ति और आनन्द पाना अच्छा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

इन सबके परे सत्ता के शिखर पर एक परम् सत्य है। शाश्वत प्रकाश है, जो पति और पत्नि को अभीप्सा और आरोह में एक होना सिखाता है। आध्यात्मिक पथ पर बढ़ाता है। पति और पत्नि के चिरस्थाई एक्य का यही मूल रहस्य है।

वेदों में माँ को एक निर्माता, रचियता, एक सृष्टा कहा गया है। जैसा कि गर्भस्थ शिशु 280 दिन तक माता के उदर में वास करता है। तब उस अवस्था में उसका विकास माँ के रक्त प्रवाह पर निर्भर करता है तथा न केवल उसके स्नायुतंत्र से प्रवाहित होता है, बल्कि मां के मानसिक विकास व उसकी रचना तथा उसकी अभीप्सा द्वारा भी नियंत्रित होता है।

मातृत्व स्त्रियों की प्रधान भूमिका है। केवल बच्चा पैदा करना एवं उसके लिये अवचेतन रूप से शरीर तैयार कर देना काफी नहीं है। सत्य रूप में माँ दिव्य विचार और संकल्प शक्ति सेसे महान् , दिव्य चरित्र की कल्पना और निर्माण करें जो किसी आदर्श को मूर्त्त रूप देने में समर्थ हो सके। सर्वोत्तम संतान को जन्म देने के लिये माता – पिता दोनों की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें स्वयं प्रार्थना की स्थिति में रहना चाहिये।

गर्भाधान के एक वर्ष पूर्व से ही संतुलित और सुदृढ़ स्वास्थ्य के नियमों का विशेष रूप से पालन करना चाहिये। उन्हें जीवन के प्रति जागरूकता, सकारात्मक सोच, संतोषपूर्ण भाव, प्रफुल्लित स्वभाव, सभी के प्रति प्रेम, प्रभु-निष्ठा होना चाहिये। इस प्रकार माता-पिता दोनों को गर्भाधान की तैयारी संयुक्त अभीप्सा तथा प्रार्थना से करनी चाहिये तथा मन को शान्ति व आनन्द से परिपूर्ण बनाकर शांत,सुन्दर वातावरण में एकाग्रता, ध्यान, अभीप्सा तथा प्रार्थना से युक्त होकर करना चाहिये। किसी शुभ दिवस में भगवान् की शक्ति का स्मरण कर महान् तथा दिव्य जीवात्मा का आव्हान कर, गर्भाधान करने से एक पूर्ण सुविकसित देह की आत्मा आती है तथा धरती का सर्वमंगल करती है।

कई दैवी जीवात्माओं का चैत्य – पुरुष अत्यंत तेजस्वी तथा विकसित होता है। अत: वे अपनी आत्म -प्रगति के लिये पुर्नजन्म धारण कर सुयोग्य माता – पिता का चुनाव करके उनके घरस्वयं आती है।

गर्भकाल में माता शांत चित्त होकर प्रफुल्लित अवस्था में आसन, प्राणायाम, योग, निद्रा, एकाग्रता, ध्यान, सुन्दर चिंतन, प्रभु स्मरण, आध्यात्मिक विचारों के साहित्य का पठन, सत्संग, भक्ति करे तो उसका प्रभाव बालक के सम्पूर्ण शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, भावनात्मक तथा अंतरात्मा और आत्मा के विकास में सहायक होता है।

नारी गर्भकाल में जहाँ गर्भावस्था के सुखदआनंद की अनुभूति करती है, वहीँ बैचेनी, घबराहट, निष्क्रियता, चिड़चिड़ापन आदि से भी प्रभावित होती है। उसे इन परिस्थितियों से भयभीत न होकर शांतऔर स्थिर रहने का प्रयत्न करना चाहिये, तभी नारी की कोख से एक महान् आत्मा का जन्म संभव हो सकेगा।

गर्भस्थ माता को गर्भकाल में ध्यान देने योग्य कतिपय विचार – गर्भवती माता को चाय, कॉफ़ी, चाकलेट, कोल्ड्रिंक्स, धूम्रपान, शराब, चीनी, नशीली ओषधियाँ, मैदा, अश्लील साहित्य, हिंसा, विलम्ब से सोना, अवसाद, भय, निराशा से दूर रहना चाहिये और इन मधुर विचारों को अपने मन में लाना चाहिये l

हे माँ भगवती, यहनन्हीं जान मेरे लिये आपका एक अनुपम उपहार है। वास्तव में यह आपकी आत्मा है। मैं तो इसे जन्म देने वाली एक मानव यंत्र मात्र हूँ। इसे आपके आशीर्वाद की अभीप्सा करने की पात्रता प्रदान करें। इसका शरीर स्वस्थ, मन तेजस्वी, ह्रदय पवित्र तथा चैतन्य आत्मा, श्रद्धा, प्रेम, तथा समर्पण का प्रतीक बन जाये l”

अत: आवश्यक है कि माता हर प्रकार के दुष्प्रभावों से दूर रहे। वातावरण शांत, समरस और सुन्दर हो। संगीत तथा भक्ति माता को तनाव मुक्त रखते हैं। सूर्य-उपासना, घर को पवित्र सुगन्धित पुष्पों से सुसज्जित करना , वस्त्र साफ़ सुथरे ढीले मनोरम तथा सौन्दर्य बोधक होना चाहिये। गर्भस्थ माता का प्रत्येक शुद्ध तथा सृजनात्मक कर्म, विचार भावना, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध चिन्तन, उच्चतम विचार, संवेदना, अभीप्सा, उल्लास, आनंद, एकाग्रता, ध्यान तथा प्रार्थना का प्रयोग एक तेजस्वी, ओजस्वी, प्रज्ञावान शिशु को धरती पर उतार लाने में महत् भूमिका अदा करेगा।

 श्रीमाँ – श्री अरविन्द के इन विचारों को अपनाकर गर्भस्थ माता के संतुलित आहार-  विहार, विचार, चिंतन, निद्रा, वातावरण, सम्पूर्ण विकास पर केन्द्रित होकर शान्ति – नीरवता और आनंद के साथ भगवान् से दिव्य शिशु के आगमन की अभीप्सा प्रार्थना व मन्त्र जप से करें।

 श्रीअरविन्द तथा श्रीमां नेकहा है – “मंत्र जप में महान् शक्ति होती है । ”मंत्रमें आव्हान होता है।मंत्र में प्रार्थना है।मंत्र में परमात्म शक्ति के अवतरण की अभीप्सा होती है। जप का परम् उद्देश्य है –मंत्र में समाहित सत्य की उपलब्धि।

श्री मां कहती है – जप के लिये जोमंत्र चुना जाता है। उसमें प्रयोजन अनुसार दिव्य शक्ति विद्यमान रहती है। यदि ठीक-ठीक नियमानुसारमंत्र में समाहित परम् भागवत तत्व के परम् सत्य, ज्ञान, शक्ति, परम् प्रेम, परम् आनंद तथा परम् चैतन्य स्वरूप पर एकाग्रचित्त होकर अपने ह्रदय की गहराई में, पवित्र भाव से स्मरण कर प्रेम तथा भक्तिपूर्वक पूर्ण शुद्धता सेमंत्र का उच्चारण किया जाये तो उसमंत्र की दिव्य शक्ति जागृत होती है। इस  प्रकारमंत्र सिद्धि प्राप्त करमंत्र जप का उद्देश्य तथा परम् फल की प्राप्ति की जा सकती है।

तो आईये, गहन शांति तथा नीरवता की गहराई में स्थित होकर परात्पर प्रभु श्री अरविन्द की पूर्ण सत्य, ज्ञान तथा प्रकाशमय चेतना का ध्यान कर वीर, तेजस्वी, प्रज्ञावान, शिशु की दिव्यात्मा का आव्हान करें।

हे परम् दिव्य प्रभो !
भागवत सत्य, ज्ञान तथा उसकी परम् ज्योति का प्रकाश मेरे अन्दर प्रविष्ट हो।
प्रकाशमान हो।
ॐ सत्यं ज्ञानं ज्योतिररविन्द।

डॉ. सुमन कोचर