दिव्य सन्देश

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When you have faith in God, you don't have to worry about the future. You just know it's all in His hands.

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ऋतायन गीत

सक्रिय सत्य की पूर्णाभिव्यक्ति

श्रीमां : श्रीअरविंद के पद-पद्मों में -

यही साध है गीतों के मिस मेरा पूरा मैं घुल जाए,

सोते-जगते चलते-फिरते

मेरा मैं तेरा बन पाए।

मेरी सत्ता इक सरिता सम

तव सागर में डूब समाए,

जीवन, वर्षा में फूलों-सम

वस्तु वस्तु का सत्य खिलाए ।

सब प्रतीक निज घूंघट खोलें

रूपायन सार्थक हो जाए,

अंधे देखें बधिर सुनें औ’,

सिद्धि ऋतायन की छा जाए।

विद्यावती कोकिल

मम शरणम्

श्रीअरविंदः मम शरणम् ।

निखिल ज्योति के ज्योतिर्धन,

हे मम जीवन के जीवन,

सकल जगत् के सत्य चरम

श्रीअरविंदः मम शरणम् ।

मेरे ज्ञान,भक्ति मेरी

जीवन,कर्म,प्रगति मेरी,

सब ध्येयों के ध्येय परम,

श्रीअरविंदः मम शरणम् ।

हृदय-हृदय के चिरवासी

जीवन-भोगी,अविनाशी

मोक्ष,काम मम धर्म धनम् ।

श्रीअरविंदः मम शरणम् ।

हुआ व्यक्ति का मुक्तिकरण,

कहां कष्ट औदुःख मरण,

यह तो प्रभु का विचुम्बनम् ।

श्रीअरविदः मम शरणम् ।

बाल वृद्ध औयुवा प्रवर,

बढ़ो अभय निज ध्रुव पथ पर,

लिए ईप्सितं चिर ज्वलितम् ।

श्रीअरविदः मम शरणम् ।

डूबें महिमा में भू-जन

शांति करे तेरी शासन,

प्रेम हरे सबके संभ्रम ।

श्रीअरविंदः मम शरणम् ।

नव ज्योति चक्र

“जगदपि ब्रह्म सत्यं न मिथ्या”

(श्रीअरविन्दोपज्ञा उपनिषद् से)

आदि काल से मनुष्य की यह तीव्र अभीप्सा रही है कि उसे सत्य चाहिए,पूर्णता,अमरता व प्रकाश चाहिए,और कुलजमा कहें तो ईश्वर ही चाहिए। यद्यपि काल के महा समुद्र पर यात्रा करता यह मनुष्य अपनी सत्य-जिज्ञासा की नई नई खोजों में अपनी नन्हीं नौका लेकर दूर सुदूर के तटों और जोखिम भरी गहराइयों में भटका है और कितनी ही पहाड़ियों,घाटियों व दलदलों में इसकी नाव फंसी है लेकिन वह फिर भी किसी न किसी नई आशा का बल लेकर निकल आई है और बढ़ती चली आ रही है। क्योंकि इस आदि अभीप्सा ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसका पीछा कभी नहीं छोड़ा है। एक दिन वह उसे जान कर ही रहेगा ।

भारतवर्ष में सत्य की यह शोध अपनी चरम सीमा पार कर गई है। परा-विद्या में कितने ऋषि-मुनियों ने आत्मा-परमात्मा के साथ तादात्म्य प्राप्त करके एक अद्भुत शांति और आनंद में वास किया है। यह तो रही ऊर्ध्वमुखी खोज । पर संसार में भी अपरा-विद्या के सागर में गोते लगा कर अनेक प्रकार के रत्नों पर रत्न निकाले गए हैं जिनसे जीवन को सजा कर बड़े ही सुन्दर ढंग से सुगठित और सज्जित किया गया है। चारों वर्णों व आश्रमों का समन्वित विचार अपने मूल में एक आध्यात्मिक विधान था। फिर भी विद्या और अविद्या दो विरोधी धाराएं ही रही हैं। ईशोपनिषद् कहता है-

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयं सह ।

अविद्यया मृत्युंतीत् र्वा  विद्ययामृतमश् नुते ।।

पर क्या विद्या-अविद्या दोनों के पार जाकर उस साम्य को यहां मानव जीवन में जिया जा सकता है?क्या दिव्य जीवन पृथ्वी पर संभव है?यदि यह संभव न होता तो यह आदि-अभीप्सा मानव हृदय में कब की मात खा गई होती। फिर प्रश्न है कि क्या दिव्य और अदिव्य या उन्नत व निम्न चेतनाओं का आपस में कोई आन्तरिक संबंध है?यदि ऐसा न होता तो जड़ में से विकास की क्रिया ही कैसे संभव होती?बराबर नीचे की चेतनाओं,जैसे प्राण व मन की प्रेरणा को ऊर्ध्व मन व प्राण की चेतनाओं का उत्तर व साहाय्य प्राप्त होता आया है तभी तो वे चेतनाएं यहां प्रतिष्ठित हो सकीं। पर वे चेतनाएं क्रमिक थीं और पूर्ण व अंतिम नहीं थीं। इसीलिए पूर्णता अभी यहां प्रतिष्ठित न हो सकी। केवल अति-मानसिक चेतना ही,जिसके कारण यह सृष्टि सम्पन्न हुई है और जो इसे बराबर धारण किए हुए है वही यहां आकर और जीवन में प्रतिष्ठित होकर इसको पूर्णता प्रदान कर सकती है। इसका पूरा उत्तर,अंतर्दर्शन,अनुभव व साक्षात्कार श्रीअरविन्द  ने अपनी चरम-परम अतिमानसिक सिद्धि से मनुष्य को अरपा है। यह अतिमानसिक चेतना के अवतरण का सुयोग मनुष्य को उनसे ही पहले-पहल प्राप्त हुआ है और जीवन में ही पूर्णता का झंडा गाड़ दिया गया है। अब सदा के लिए उसके आशा के द्वार खुल गए है। उन्होंने इस चेतना को पहले अपने शरीर पर उतारा और फिर श्रीमाँ ने अपने तप से उसे सन् १९५६ में जड़ता की कोख में उतार कर मानव विधि को ही बदल डाला है। इस प्रकार एक नए प्रकाश-चक्र का आरंभ कर दिया है। यदि अचित् में से विकास की क्रिया का पूर्व-चक्र सत्य है और यदि जड़ता से प्राण व मन की चेतना का उद्भव हो सका है तो जड़ता की गठरी में अभी जो कुछ बंधा पड़ा है वह भी निश्चय ही खुल कर रहेगा। श्रीअरविन्द अपने दिव्य जीवन में कहते हैं,यदि पशु प्रकृति की एक ऐसी जीवित जाग्रत् प्रयोगशाला है जिसमें उसने मनुष्य की रचना की है तो मनुष्य स्वयं एक चिंतनशील और जीवित जाग्रत् ऐसी प्रयोगशाला है जिसके चेतन सहयोग से प्रकृति अतिमानव की रचना करना चाहती है। यहीऋतायनकी सिद्धि है जो सृष्टि में अभी भी छिपी पड़ी है। ऋतायन का अर्थ है सक्रिय सत्य की पूर्णाभिव्यक्ति ।

अतिमानसिक चेतना ही सच्चिदानन्द की अभिव्यक्तिकामी वह पूर्ण चेतना है जो सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिशाली भी है। यह किसी भी निम्न चेतना की अज्ञानता के साथ समझौता नहीं करेगी,यदि यह ऐसा करती है तो पूर्ण नहीं रह सकती। यह यदि समझौता करे तो मन,प्राण व जड़ में जो अतिमानसिक शक्ति अनभिव्यक्त पड़ी है वह कैसे व्यक्त होगी?और वह न व्यक्त हो तो उस चेतना का अवतरण यहां स्थायी कैसे बनेगा?मन,प्राण शरीर ही तो उसका आधार हैं। तो फिर साधना की प्रक्रिया का एक मात्र तरीका है उनका अतिमन में रूपांतरण। श्रीमां ने उस चेतना को जड़ में उतारकर नींव से ही अर्थात् अचित् से चित्-विकास को सतत गति प्रदान कर दी है। इसके बिना आज के वर्तमान मन की समस्याओं का समाधान असंभव था। यदि ऐसा न किया गया होता तो आज संसार सर्वनाश की स्थिति में पहुंच गया होता । लेकिन अब उसे बचा लिया गया है।

क्या जड़ता में से प्राण ने प्रकट होकर फूलों,कोंपलों,पौधों और पेड़ों के मौन संकेत से हमें प्रारंभ में ही आत्मा के प्रथम प्रस्फुटन का विशाल दर्शन नहीं करा दिया था?इनमें छिपी चेतनाओं का इतिहास मौन भाषा में हमें कुछ इंगित नहीं दे गया था?पर उसे किसने समझा?इस इतिहास को भी हम आज श्रीअरविद व मां के द्रष्टा अंतर के प्रकाश में ही पढ़ने में समर्थ हुए हैं। मानव को ही तो फूलों में प्रच्छन मौन चेतनाओं की पूर्णता को प्राप्त करना है। यह सिद्धि केवल मोक्ष के मार्ग और चित्त-वृत्ति-निरोध के द्वारा संसार से मुख मोड़कर साधित नहीं होगी। उसे मन व प्राण की सभी शक्तियों के पूर्ण स्फुरण के लिए उनका रूपांतरण साधित करना और उनको अपने सत्य स्वरूप की ओर खोलना होगा। यह रूपांतरण ही एक तरफ इस जीवन लीला के और दूसरी ओर उस ऐकांतिक मोक्ष के बीच के अपाट्य खात को भर सकता है,जो पहले कभी नहीं भरा गया। इस सारी साधना के विस्तार,खिलाव व पूर्णता के आनंद का हमें उनके महाग्रन्थदिव्य जीवनमें और महाकाव्यसावित्रीमें रसास्वादन करना होगा। मेरा इस विषय में कुछ कहना तो छोटे मुंह बड़ी बात होगी।

यहां मुझे श्रीअरविन्द दर्शन के विषय में कुछ कहना इसलिए आवश्यक हो गया कि मेरी इन कविताओं में इन्हीं विचारों की एक टूटी फूटी झांकी मिलेगी। यद्यपि वे भी उन विचारों का छोटे मुंह बड़ा गान ही हैं। इसी लिए अत्यन्त विनम्रता व संकोच से मैं इस संकलन को ले कर आपके सम्मुख आ रही हूं। यह कोई मेरे कवि,लेखक या साहित्यकार का परिचायक नहीं,वैसा बनने का मेरा ध्येय ही कहां रहा,उसके लिए कभी तैयारी या साधना ही कहां की गई?ये कविताएं तो एक भटकते जीव की कहानी हैं जो संसार में आकर किसी चरम-परम ध्येय के जानने या पाने के लिए आकुल व्याकुल रहा है। उसी व्याकुलता में वह संसार के दुःख-सुख,बाधा-बंधन,राग-द्वेष,इच्छा-अनिच्छा,मोह-ममता,आकर्षण-विकर्षण,उन्नति-अवनति,ठहराव-भटकाव अभिमान और उदारता के भावों को लिए-लादे घूमता फिरता रहा । मैं बराबर इनसे बाहर निकलने का मार्ग ढूंढ़ती रही,पर व्यर्थ,मुझे वह मिला नहीं। यह एक अनचली,अनसुनी और अननुकृत यात्रा थी। हां,एक अनजाना,अनदेखा,आग्रही पथप्रदर्शक चाहे-अनचाहे मेरे साथ लगा रहा है जिससे मैं अपना पीछा नहीं छुड़ा पाई हूं । वह थी एक अनन्त,अजस्र और अखण्ड छन्द कीलयजो बचपन से ही मेरे हृदय में सागर की तरह गूंजती आई है। यह मुझ से कुछ आशा भी करती आई है जिसे मैं कभी पूरा नहीं कर सकी। माता-पिता ने बचपन में उसे शायद एक संगीत प्रेम कर के जाना होगा। गांधीवादी पिता ने मेरी चार-पांच वर्ष की आयु से ही खिलाफत आदि की सभाओं में इस संगीतमयता का भरपूर इस्तेमाल कर लिया था। युवावस्था में उसी को काव्य प्रेम समझा गया होगा। पर कहां?संगीत सीखने का प्रयत्न भी सफल नहीं हुआ। मैं संगीत की बंधी ताल-लय में कहां रह पाती थी। मैं उसके बाहर निकल जाती। और कविता में भी तो जब तक हिन्दी काव्य क्षेत्र में गीतों के प्रति आदर रहा तब तक अपनी लय के साथ सही या गलत एकता साध कर मैं चहकती रही और लोग समझते रहे कि मैं कविता अच्छी पढ़ती हूं । वे उस पर मुग्ध होते रहे। पर असल आकर्षण तो था उसलयका जिसके विचार कभी व्यक्त ही नहीं हो पाए। पर जब कविता ने नए रूप-रंग धारण किए,मुक्त छन्द के नाना प्रयोग होने लगे कविता,नई कविता,अकविता और न जाने कितने नाम । तब मैं उस होड़ में उनके साथ न चल पाई। बस मैं फिर हर जगह लकीर से अलग होती रही। यदि काव्य ही मेरा ध्येय होता तो समय के बहाव में औरों के साथ मैं भी बदल गई होती। पर कहां,इसी लिए कहना पड़ता है कि कविता मेरा साध्य नहीं एक साघन जरूर है।

आखिर अंतर समन्वय की प्रतीक उस छन्द और लय से जीवन में कभी जुड़ते कभी टूटते,टूटन में कराहते और जुड़ने में एकता का आनंद लेते और फिर उस आनंद को ढूंढ़ते,पकड़ते- इस सब से थक कर,हार-कर एक दिन मेरे मन ने विद्रोह कर ही दिया। मुझे लगा कि पर्दे के पीछे एक सच्चा जीवन स्पन्दित हो रहा है। उसकी सुगन्धि,उसका आनंद और प्रकाश मुझे जरूर मिल सकता है। पर पर्दा फाड़ना होगा,दीवार ढहानी होगी। वह कैसे हटाया जाय मुझे मालूम न था। जैसे कोई तैराक बहुत दिन समुद्र में तैरते-तैरते थक कर ठीक अपनी चरम निराशा के समय एक नए द्वीप की खोज कर ले वैसे ही मैने भी श्रीअरविन्द  और श्रीमां की छाया को प्राप्त कर एक दिन संतोष की सांस ली। बस फिर मेरी कविता,साहित्य-प्रेम व संगीत-प्रेम ही नहीं अपितु सभी कार्य- घर गृहस्थी के संबंध,समाज सेवा व देशप्रेम की लगन आदि सभी का अर्थ लग गया। और मेरा ही क्या,देखती हूं कि संसार के दर्शन,ज्ञान,विज्ञान,धर्म,राष्ट्रीयता,मानव एकता और सौन्दर्य बोध व कला बोध ही नहीं जीवन के सारे व्यापार ही मुझे इस अध्यात्म की परिभाषा के अंग बने मालूम होते हैं।

तो फिर पाठकों को यदि ये एक असंगत प्रलाप भी लगें तो वे मुझे क्षमा करेंगे। एक बालक जिसे अपने स्वप्न में देखी पूरी सृष्टि,हठात् सचमुच ही देखने को मिल जाए वहां का जीवन,लोग,उनके विचार,एक नई दिनचर्या,अभय का राज,दुःख कष्टों के बीच भी प्रसन्न मुख-मुद्राएं,बूढ़ों में भी बच्चों की चंचलता,जहां मृत्यु को भी एक लीला ही समझा जाता होवासांसि जीर्णानि यथा विहाय। नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।।तो ऐसे जीवन को देखकर वह बच्चा क्या खुशी से पागल नहीं हो जाएगा और अपने भाई बहनों को उसके विषय में कुछ सुनाना नहीं चाहेगा?अपनी आश्चर्य भरी अनुभूतियों को अपने संबंधियों पर व्यक्त करना नहीं चाहेगा?

यह मेरी कविताओं का एक प्रतिनिधि काव्य संग्रह है। मैं देखती हूं कि अपने-आप यह मेरे अंतर-विकास की एक कहानी बन गया है। इस संग्रहरूपी भवन में मैंने पांच खण्ड किए हैं। प्रथम खण्ड तो मेरे भवन की नींव ही है अर्थात् पहले मैंने श्रीअरविद की विचार धारा को कुछ अधिक स्पष्ट करने वाली कविताओं को रखा है,जिससे पाठक कविताओं में सब जगह उनकी विचार धारा को पकड़ सकें। यह एक नवीन-तम विचार धारा का प्रयोग है। अतः सर्व प्रथम मैं स्वयं श्रीअरविन्द  की ही एक कविता के अनुवाद को रखने का साहस कर बैठी हूं । यह कविता नहीं एक महामंत्र है। इसमें मुझे स्रष्टा,सृष्टि व सृष्टि का उद्देश्य,तीनों ही भाव एक साथ स्पन्दित होते लगते हैं। इसमें काव्य,कला का रस और कवि एक ही हो गए हैं, ‘रसो वै सःसाकार हो उठा है। अरुण प्रभ गुलाब से अधिक सुन्दर और सृष्टि में सत्य,शिव,सुन्दर के भाव को एक साथ व्यक्त करने वाला दूसरा क्या प्रतीक मिलेगा?इस कविता का नाम “भागवत गुलाब” (Rose of God)रखा गया है। इसमें स्रष्टा की पांच ध्यान-सघनताओं के तपस् का वर्णन है। प्रत्येक पद में इन्हीं विभिन्न पांच नामों से उसका संबोधन किया गया है और प्रत्येक पद के अन्त में सृष्टि के आदि स्रोत उन पांचों दिव्य भावों से पृथ्वी पर अभिव्यक्त होने की प्रार्थना की गई है। इसमें है सृष्टि का पूर्ण साफल्य,मानव जीवन का चरम प्राप्तव्य और उनकी ऋषि दृष्टि का पूर्ण संकेन्द्रण । यह कविता कुछ कठिन है इसी लिए इसका अंग्रेजी मूल अंत में दे दिया गया है।

दूसरे खंड में मेरी व्यक्तिगत अनुभूतियों की कहानी है।दूर कहीं जाना हैकविता से इस बात का भान होता है कि मुझे किसी ऐसे वातावरण में,ऐसे देश में जो वर्तमान समस्याओं का समाधान उपस्थित कर सकता है,जाना है। कहां,यह मैं नहीं जानती थी। श्रीअरविन्द  आश्रम आने पर और श्रीमां के दर्शन व उनके संपर्क से तृप्त होने पर एक अनोखा अनुभव,उसे समझने,जानने व पाने की आकुलता,साथ ही अपनी दुर्बलताओं व कठिनाइयों और अज्ञान की अड़चनइन सबके लिए उनके प्रति समर्पण ही एकमात्र मार्ग है,इसका निश्चय। पर,मेरे बिना प्रयत्न के अपने-आप ही प्रार्थना,लगन व भक्ति की मुद्रा में भाषा,छन्द व भाव स्वयं ही यहां बदल जाते हैं। इनकी आत्मीयता की मस्ती पर मेरी साहित्यिक बुद्धि एक बालक की भांति ताकती रह गई है। इन गीतों की भक्ति ऐकांतिक न होकर जीवनमुखी है। यहां सत्ता के अंगों को अंतरतम की ओर खोलकर जीवन में ही उस शान्ति व आनंद को उतारने का यत्न है।

तीसरे खण्ड में मेरी लय अब मुझे अपने-आप में और किसी ऐकांतिकता में ही संतुष्ट नहीं रहने देती । अपने परिवेश,अपने समाज व राष्ट्र की ओर भी मन जागरूक हो जाता है। यों भी आरंभ से ही ये दोनों भाव मेरा स्वभाव थे। देश के स्वतंत्र होने तक मेरा मन देश सेवा की ओर तल्लीनता से झुका रहा है । यह मेरी अंतर्लय का एक अंश और मुद्दा ही बना रहा है। अब इस अंतर-गहराई को देशभक्ति की नई भावना में अर्थात् एक आध्यात्मिक विशालता से अभिसज्जित होने का अवसर मिलता है। मेरी लय के अधीन बना अब मेरा बालकआत्मवत् सर्वभूतेषुकी दृष्टि से देखना चाहता है। इस खण्ड में देश प्रेम,एकता व मानव प्रेम की कुछ कविताएं आ जुड़ी हैं। श्रीअरविन्द  की मान्यता है कि भारत एक आध्यात्मिक शक्ति है,यह शक्ति ही तो संसार का केंद्र है,इसलिए भारत यदि कभी जगत्-गुरु था और आगे भी उसकी चेतना इतनी विशाल बन जाय कि अपने में संसार की वर्तमान विचार धाराओं को समेटकर वह सब की समस्याओं का समाधान उपस्थित कर सके तो पुनः उसी कोटि में एक नई विशालता के साथ पहुंच सकता है।

इन सब भावनाओं का आलिंगन करके चौथा खण्ड मानव की स्वर्णिम भावी विधि की ओर अग्रसर होता दिखाई पड़ता है। शरीर के ऊर्ध्वीकरण की ओर विशेष दृष्टि जाती है। यहां मन,प्राण व फिर ज्ञान,भक्ति और कर्म तीनों के समन्वय की प्रेरणा अनिवार्य हो जाती है। चेतना के आरोहण की गति के साथ अवरोहण की अजस्त्र धारा भी स्वाभाविक रूप से नीचे उतरती है। शान्ति,एकता व प्रेम की शक्तियां जब यहां अवतरित होकर प्रतिष्ठित हो सकें तभी वे स्थायी बन सकती हैं। अतः श्रीअरविन्द  के अनुसार मन,प्राण का रूपांतर ही एकमात्र हमारा ध्येय है । तो फिर चौथे खण्ड के अंत में यदि वह बालक अवरोहण के प्रभाव का सर्वग्राही अनुभव करे और उसकी दृष्टि अदृष्ट चीजों पर केंद्रित हो उठे तो आश्चर्य ही क्या?वह फूलों में एक नए संदेश को सुन सकता है,उनकी चेतनाओं में आत्मा के अनावरण के आकर्षण का आनंद ले सकता हैं। मानव शिशु भी तो एक चैतन्य फूल ही है। मन,प्राण अक्सर उसे अपनी निम्न चेतना से विकृत बना देते हैं,पर वे अपनी शुद्ध चेतना से उसे बहुत ऊंचा भी उठा सकते हैं। यदि हमारी नई शिक्षा के लिए उठी उन्नत व नवीन जिज्ञासा आज साधना का मार्ग ग्रहण कर सके तो हम शिशु के भोले भाव को,उसकी निर्मल मुस्कान को सदा के लिए सुरक्षित रख सकते हैं और इसी संसार को स्वर्ग बनाने का मार्ग ढूंढ़ सकते हैं। शिक्षा के इस नवीन ध्येय को लेकर ही भविष्य के निर्माता इन शिशुओं पर कुछ लिखने की बात सोची गई है और लिखना प्रारंभ हुआ है।

जैसे आदि में वैसे ही अंतिम खंड में श्रीअरविन्द  की कविताओं के कुछ अनुवादों से समापन होता है। उनके द्वारा लिखित एकमात्र गीतस्वप्न तरीभी इसमें है और श्रीमां कीप्रार्थना व ध्यानपुस्तक से दो प्रार्थना-अंश भी । अंत में उदाहरण के लिए उनकेसावित्रीमहाकाव्य के अनुवाद का एक छोटा अंश। यह सागर की एक बूंद,यहां केवल पाठकों को उसके परिचय स्वरूप रखी गई है,जिस सागर के किनारे पहुंच कर मेरी अनंत अंतर्लय ने एक तृप्ति की श्वास ली थी। और फिर उसका यह आग्रह कि वह इस काव्य को अपनी भाषा में दिन-रात गाएगी,अद्भुत ही है। पर प्रश्न था कि इस विशाल महाकाव्य का और इसकी मांत्रिक विचार-धारा का अनुवाद क्या हिन्दी में हो सकता है?मंत्रों और ऋचाओं का अनुवाद ऋषि दृष्टि के बिना कैसा?लोक-भाषा और छन्द उस सत्य-दृष्टि को कैसे व्यक्त कर सकते हैं?पर एक अबोध बालक सभी कुछ को लेकर खेल कर सकता है। श्रीमां ने भी न जाने क्या सोचकर इस बालक को खेल करने की अनुमति दे दी । और अनुवाद का यह खेल १०-१५ वर्षों तक बिना थके एक प्रेम-परिश्रम की भांति चलता रहा । शिशु भाव में कुछ असंभव भी संभव हो जाते हैं। अनुबाद के लिए छंद व शब्दों और शैली संबंधी कितनी सतर्कताएं बरतने के लिए साहित्यिक पंडितों के सुझाव आए,पर यह लोक छन्द जो अजस्त्र गति से मेरे भीतर गूंज रहा था इसी में मैंने बिना किसी परिवर्तन के ८०० के लगभग पृष्ठों का अनुवाद सम्पन्न किया। अंग्रेजी की एक पंक्ति करीब करीब एक पंक्ति में ठीक बैठती चली गई। जहां लय भंग होने की संभावना हुई वहां मैने अनुप्रास की चिन्ता नहीं की। जहां वह अनायास ही आता गया,आने दिया। यह अनुवाद भला बुरा जैसा भी है इसका श्रेय मेरी अन्तर्लय को ही है। पाठक मूल से मिलाकर पढ़ेंगे तभी इस शब्दशः अनुवाद के कार्य की कठिनाई को समझकर इच्छानुसार आनंद का दुग्ध-दोहन कर सकेंगे।

अंत में यह समझकर किईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठतिके भाव में मैं उन्हीं को नमस्कार करके लोक संग्रह के लिए कर्म करते हुए और फलाफल को भी उनकी इच्छा पर छोड़ते हुए सब कुछ उन्हीं को समर्पित करती हूं।

यदि यह सच है कि जड़ में आत्मा अंतर्लीन थी और यह अपरा प्रकृति प्रच्छन्न रूप से ईश्वर ही है तो भगवान् का अपने में अभिव्यक्तीकरण और भीतर बाहर उनका पूर्णाविर्भाव ही सर्वोच्च अवस्था है,और मनुष्य के लिए यही उद्देश्य पूर्ण युक्तिसंगत और वैध है।